तजुर्बे का पेड़

नेहा शमा की कविताएं, कहानियां, आलेख निरंतर अखबारों में छपती रही हैं और लोगों की प्रशंसा पाती रही है । उनकी उन्ही कवितायों की डायरी में से एक नयी कविता 'तजुर्बे का पेड़' आप सबके बीच -
नेहा के ही शब्दों में कि लिखना उनके लिए क्या मायने रखता है-
"मैं लिखती हूँ , क्योंकि मेरा मानना है की मेरी रचनाओं से संभावनाओं और असंभावनाओ का मिलन संभव है. मैं लिख सकती हूँ जो मैं कल्पना करती हूँ अपने सपने में , हृदय में, दिमाग में और मेरे वो शब्द थाम सकते हैं भावनाओं, विचारों और आदर्शो का भार."


तजुर्बे का पेड़
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मासूम सा पौधा था
पाकर हालातों  की कड़ी धूप
और सहुलियतो की हल्की बारिशे
तजुर्बा मेरा
अब बड़ा पेड़ बन गया है !
कभी जो फुरसत के मौसम मे
वक्त की धीमी हवाओं के बीच
इल्म की छाँव तले
जहन की सतह पर
कहीँ डूबती कही उबरती
सीख की जडे निहारती हूँ,
तो किसी बदमाश बच्चे सा ये दिल
अकेलेपन के पत्थर उठा फेंक
गिराता है बीते किस्सों के कुछ फल !
फ़िर भाग भाग चुनता है,उन्हे चखता है,
कुछ मीठे हैं तो कुछ खट्टे
पर तुम्हारे साथ बीते जो
पल
वो कड़वे हैं !
कमबख्त
ये खराब याददाश्त के कीडे भी
मीठे फलों मे ही लगते हैं !
थोड़ी देर बाद
दर्द की लाठी ले
मेरा फिलहाल आता है
और वो बदमाश बच्चा
छिप जाता है
मसरूफियत के झाड़ के पीछे !