कुमार राहुल की दो कवितायेँ

राहुल गीतकार है और कवितायेँ खोजता रहता है. वो चाहता है कि वो कविताओं के आसपास रहे हमेशा. उसके शब्दों में, "कविता मेरे लिए कहानी कहने का एक खुबसूरत अंदाज़ है । शायद उस धागे के मानिंद भी जिसमें जीवन के कुछ अनगढ़ मगर नायाब मोती पिरोये जाते रहे हैं । कुछ ऐसे ही अनगाये-अनसुने गीतों को अधर देने की कोशिश मेरी भी है ।"

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१.

जाने जीवन की चौसर पे, मन हारा है कितनी बार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
पण में हारी पांचाली की
मैं पराधीन परिभाषा हूँ
नैनों में थामे बाग काल की
शाकुन्तल अभिलाषा हूँ
एक कहानी लिख जाने में, दूजी जाऊं अक्सर हार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
संघर्षों में हंस के - गा के
जीवन को भरमाया है
मीत रहे दृग जल के आगे
वैतरणी को ठुकराया है
दिन महीने वो साल न पूछो, जीते थे कैसे मन मार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
अभिजनों में घिरी हुई
मैं अपमानित जिज्ञासा हूँ
अर्जुन को मैं भेंट द्रोन की
याचित कोई पिपासा हूँ
मान अपमान का खेल पुराना, खेल गया है फिर संसार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...

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२.

न तुमको खबर है
न हमको पता है
सुना है ख़ुदा भी
हुआ लापता है
हर मसले में जैसे
खलिश है खला है
बहुत सोचना भी
मगर एक बला है
जहाँ पे खड़े थे
वहीँ पे खड़े हैं
ये दुनिया के पचरे
दुनिया से बड़े हैं
किसी को खबर हो
तो हमको बताये
है जादू तो जादू
हमें भी सिखाये
इधर रस्ता देखें
कि देखें उधर को
तुम्हीं बोलो जाएँ
तो जाएँ किधर को
फिर तो वही बात
हो गयी न प्यारे
न तुमको खबर है
न हमको पता है
सुना है ख़ुदा भी
हुआ लापता है...

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