फैज़ की दो रचनाएँ

फैज़ किसी परिचय के मोहताज़ नहीं। फैज़ को पढ़ना हर उस आदमी की रूह को पढ़ना है जो किसी भीड़ में खोया हुआ संघर्षरत साधारण आदमी है। चाहे रोमानी तेवर की बात हो या नज़्मों की कारीगरी में सिमटे दर्द की, फैज़ अपने चाहनेवालों को अपनी दुनियाँ में बरबस ही खींच ले जाते हैं।
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जब तेरी समन्दर आँखों में
ये धूप किनारा, शाम ढले
मिलते हैं दोंनो वक़्त जहाँ
जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर में अमर, पल भर में धुआँ
इस धूप किनारे, पल दो पल
होठों की लपक, बाँहों की खनक
ये मेल हमारा झूठ न सच
क्यों रार करो, क्यों दोष धरो
किस कारन झूठी बात करो
जब तेरी समंदर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोएँगे घर-दर वाले
और राही अपनी रह लेगा
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे!
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
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