मुसाफिर कैफ़े

इस साल के सितम्बर में आई हिन्दी नॉवेल है ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ । लेखक हैं दिव्य प्रकाश दुबे और प्रकाशक हैं हिन्द युग्म और वेस्टलैंड . बुक का सोशल मीडिया पर जम से प्रचार किया गया । किताब का वीडियो ट्रैलर भी बनाया गया । जो हिंदी में एकदम नया काम है। प्रकाशक का दावा है कि बुक 10 दिन में 5000 बिक गयी । जो कि हिंदी प्रेमियों के लिए खुश होने वाली बात है। मैं ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ को कुछ दिन पहले ही पढ़ा हूँ। लेकिन बुक पर इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मुझे ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ ने उत्साहित या निराश किया. बल्कि बुक के बैक कवर पर लिखे कुछ वाक्य ने मुझे लिखने को विवश कर दिया ।
--Story--

नॉवेल का मेन कैरेक्टर है चन्दर। जो सॉफ्टवेर इंजिनियर है। उम्र शादी की हो गयी तो घर वाले प्रेशर डाल रहे हैं शादी करने के लिए। सेकंड कैरेक्टर है सुधा जो लॉयर है। फैमिली कोर्ट में डिवोर्स दिलवाती है । उसके फैमिली भी शादी करने के लिए प्रेशर डाल रहे है। चंदर और सुधा एक ही शहर मुंबई में रहते हैं और संयोग से दोनों एक दुसरे को शादी के लिए मिलने जाते हैं. सुधा को शादी से एलर्जी रहती है और चंदर का उसकी एक्स गर्लफ्रेंड का प्रॉब्लम रहता है. बस घर वालों के कहने पर मिलने चले जाते हैं . चंदर और सुधा दोनों एक दुसरे को रिजेक्ट कर देते हैं और फॅमिली को बोल देते हैं पसंद नहीं आया. एक दुसरे को रिजेक्ट करने के बावजूद दोनों टच में रहते हैं . बाद में सुधा और चंदर लिव इन में रहने लग जाते हैं. चंदर को सुधा अच्छी लगने लग जाती है वो सुधा को बार-बार शादी के लिए अप्प्रोच करने लग है. लेकिन सुधा हर बार शादी को अवॉयड करते रहती है. बाद में दोनों बिना शादी के ही हनीमून पे जाते हैं. हनीमून से आने के बाद चंदर एकदम से सब कुछ छोड़ मसूरी चला जाता है. जहाँ उसे मिलती है पम्मी. पम्मी के साथ मिलकर चंदर मसूरी में एक कैफ़े खरीदता है और नाम देता है मुसाफिर कैफ़े. नावेल की कहानी फिर दस साल जम्प करती है. चंदर को पता चलता है सुधा प्रग्नेंट थी और वो एक बच्चे का पिता बन गया है. 
कहानी के दुसरे हिस्से मुंबई में सुधा अपने बेटे अक्षर के साथ रह रही है. अब वह मुंबई की टॉप लॉयर बन गयी है. अभी तक उसने शादी नहीं की है. लेकिन अपने लाइफ को सेकंड चांस देने के लिए अपने फर्म पार्टनर विनीत से शादी को सोचती है . विनीत को अक्षर का पिता ही मानते हैं . शादी करने के ख्याल से सुधा अक्षर का एडमिशन देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में कराने जाती है . सुधा देहरादून से मसूरी चली जाती है. जहाँ वह मिलती है चंदर से. चंदर अब फिर से सुधा के साथ रहने लग जाता है अपने बेटे अक्षर,और पम्मी के साथ . अक्षर पम्मी को बड़ी मम्मी बुलाता है . और फिर होती है नावेल की हैप्पी एंडिंग .

--Inside Book --
दिव्य प्रकाश इस नावेल के पहले स्टोरी लिखते थे उनकी दो कहानी संग्रह है ‘टर्म एंड कंडीशन अप्लाई’ और ‘मसाला चाय’. जो की ठीक ठाक है. पता नहीं दिव्य को नावेल लिखने की कहाँ से सूझी. सबसे पहले आते हैं कथानक पर. कथानक कुछ भारी भरकम नहीं है जिस कहने के लिए नावेल लिखनी पड़ जाये. मुसाफिर कैफ़े को कहानी या लम्बी कहानी के शक्ल भी कहा जा सकता था. नावेल में वातावरण चित्रण पर मेहनत कम किया गया है. पाठक को अपने स्तर पर वातावरण की कल्पना करनी पड़ती है . बुक में संवाद भरे पड़े हैं . बल्कि यह डायलाग बेस्ड नावेल है . शायद लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने फिल्म स्क्रिप्ट के लिए एक्स्ट्रा मेहनत नहीं करना चाह रहे थे . कहीं-कहीं किताब बोरिंग लगने लग जाती है. नावेल में अच्छे-अच्छे वन लाइनर हैं, लेखक ने सबसे ज्यादा मेहनत वही की है. 
अब आते हैं इसके सबसे जरुरी पॉइंट पर. नावेल के कैरेक्टर . सुधा , चंदर और पम्मी . ये तीनों पात्र धर्मवीर भारती की कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ लिए गये हैं . दिव्य प्रकाश गुनाहों के देवता के पात्र को उठाने की प्रक्रिया को धर्मवीर भारती को श्रधांजलि देना बता रहे हैं. मेरी समझ से ये श्रधांजलि से आस पास वाला काम भी नहीं है. गुनाहों का देवता में सुधा और चंदर कहीं भी अपने प्रेम का इजहार तक नहीं करते और कई पाठक पीढियां सुधा और चंदर को आदर्श प्रेम मानती आ रही है. लेकिन वही दो कैरेक्टर के साथ दिव्य प्रकाश सेक्स अपील पैदा कर रहे हैं. जो मेरे ख्याल से पाठकों को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा.
बैक कवर पर किसी the news express के हवाले से लिखा गया है कि glory days of hindi literature are here again . रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य का ग्लोरी पीरियड यानि स्वर्ण काल भक्ति काल को मानते हैं . कबीरदास , जायसी , तुलसीदास, सूरदास मीरा बाई का काल. अगर the news express को लगता है दिव्य प्रकाश के लिखने से हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल वापस आ जायेगा तो यकीन मानिये मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं होगा . लेकिन वह वर्तमान साहित्य में भी स्थान नही बना पाता . संभव है की प्रचार के दम पर किताब की हजारों प्रतियाँ बेची जा सकती है . लेकिन पाठक हर बार प्रचार के दम पर बुक खरीद ले संभव नहीं लगता है. पाठक बुक में खुद का मनोरंजन ढूंढता है , लेकिन उसे किताब में डेप्थ भी तो चाहिए होता है . तभी तो राइटर या बुक का फोरेवर फैन बना पाता है . मुसाफ़िर कैफ़े की भाषा तो हिंदी है लेकिन इसमें हिंदी पट्टी नहीं है . जो सबसे ज्यादा खटकती है . महानगर की कहानी को इंग्लिश राइटर अर्से से बेच रहे हैं . वही काम दिव्य प्रकाश हिंदी में कर रहे हैं.
--Final Words--
मुसाफ़िर कैफ़े उन पाठकों के लिए हिंदी में प्रवेश द्वार की तरह है जिन्होंने स्कूल के बाद हिंदी पढ़ी ही नहीं. किताब की भाषा सरल है . आम बोलचाल आने वाले इंग्लिश के शब्द को हुबहू रखा गया है. दिव्य प्रकाश साहित्यिक जमात से अलग अपनी राह चल रहे हैं . यह पगडंडी कब हाईवे बनेगी नहीं कहा जा सकता लेकिन दिव्य प्रकाश को नई राह के लिए शुभकामनाएं .

-सुधाकर रवि