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मनोज कुमार झा : हर भाषा में जीवित-मृत असंख्य लोगों की सांस बसती है

पढ़ते हुए 3 : गंदी बात @ क्षितिज रॉय

शहर डायरी : पारो के लिए 

रोमियो ओ रोमियो

जब तक आदमी का होना प्रासंगिक है कविता भी प्रासंगिक है - कुमार मुकुल

पढ़ते हुए 2 : गीत चतुर्वेदी, न्यूनतम मैं !

पढ़ते हुए, एक : रंजन बाबू के गाँव में

मील के पत्थर

बैसाख का महीना - निशान्त

किसी तस्वीर में दो साल - उपांशु

Bandukbaz Babumoshay : the cult it could have been.