वीडियो एडिटिंग -निशांत 

जो अभी-अभी बीता वही भविष्य था. 
बारह बजने के तीस सेकेंड पहले मैंने एक ऐसा सपना देखा जो बस उम्र के प्रभाव के चलते ही देखा जा सकता था. अब मुझे भी ऐसे सपने आने लगे थे जो मेरे शरीर को झनझना देते थे. मैं सपनों की दुनिया में पसीने से तारतार हो जाता और शर्म के मारे एक लाल तौलिये से अपना मुँह ढँक लेता और एक हरे रंग कि तौलिये से अपना गर्दन पोंछने लगता. मेरे हाँथ पेट के ज़रा सा नीचे जाकर अचानक ऊपर आ जाते और फिर स्वचालित होकर उसी जगह पर एक बेढंगे किरायेदार की तरह टीक जाते.

तीस सेकेंड बाद मेरी उम्र का बाद वाला अंक पाँच से छ: हो गया. मेरे दोस्त राकेश ने मुझे बताया था कि-‘ ऐसा होने पर राकेश के पास एक कॉल आता था जिसके उस पार से दबी हुई एक आवाज़ आती, हैप्पी बर्थ डे डियर’. इसके आगे राकेश ने कभी मुझे कुछ नहीं बताया.

पर मेरे मन ने मुझे बताया की-‘ इसके आगे राकेश फोन से ही एक पप्पी शेयर करता होगा और चाँद-तारे वाली एक-दो शायरी कहता होगा’. फिर मैंने उस आवाज़ को भी पहचान लिया. वह आवाज़ जिसपर राकेश मरता था , वह आवाज़ शालिनी भारद्वाज की थी. एक दिन मैंने देखा था कि शालिनी भारद्वाज स्टेशन के पीछे वाली मंदिर पर किसी का इंतजार कर रही थी. दिसंबर का महीना था. शायद साढ़े पाँच बज रहा होगा, लेकिन आँखें खोलने पर आठ बजे का सुनसान मालूम होता था. माँ जब सात साल पहले मुझसे ख़ूब बातें किया करती थीं, तब उसने मुझे बताया था कि- मंदिर का वक़्त जाड़े में तीन घंटे आगे निकल जाता है. मंदिरों में देवियाँ रहती हैं और शर्दियों की हर शाम को वे अपने भगवान से मिलने निकलती हैं. देवियों को सिर्फ पुजारी ही देख पाते हैं.

शालिनी हमारे शहर की सबसे खूबसूरत लड़की थी. उसके आशिक़ों की लंबी लिस्ट थी.पहला आशिक़ था एक रिक्शेवाला जो फिज़िक्स क्लासेज़ से शालिनी को उसके घर तक छोड़ा करता था. क्योंकि शालिनी शहर की सबसे खूबसूरत लड़की,उसके पास सौ के नोट से कम कुछ नहीं होते थे. रिक्शेवाला शालिनी से सौ का नोट लेकर एक चायवाले के पास जाता और दस का नौ नोट वापस लेकर आता.नौ नोटों को वह शालिनी को नौ बार में देता और अंतिम में तीन शब्दों का एक सीधा सवाल पूछता-” ठीक है न”. इतना करने में उसको तीन मिनट छत्तीस सेकेंड का वक़्त लगता और इस दर्म्यान चायवाला शालिनी भार्द्वाज को अपनी कनखियों से से साठ बार देखता. चायवाले और रिक्शेवाले ने अंतराष्ट्रीय स्तर का कोई पैक्ट साईन किया था. “ठीक है न?”. ऐसा पूछने पर भी उसे कोई जवाब नहीं मिलता.

अचानक एक दिन मैंने देखा कि- राकेश एक रिक्शेवाले को पीट रहा है. बीच-बचाव करके जब मैंने राकेश को विदा किया तो रिक्शेवाले ने एक दिलज़ले आशिक़ की तरह मुझे बताया की राकेश और शालिनी रोज़ मंदिर के दक्खिन वाले कोने में एक-दूसरे से मिला करते हैं.

जिस शाम की मैं बात कर रहा था, मैं वहाँ लौटकर आना चाहता हूँ. छ: बजते ही शालिनी ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को छ: बार देखा. ठीक सात मिनट बाद मैंने राकेश को आते हुए देखा. वे दोनों दक्खिन वाले कोने में गये. राकेश ने शालिनी को अपनी आगोश में ले लिया. शालिनी ने उसे झटक दिया और अपने हिस्से का गर्म चुंबन देकर नीले रंग की रजिस्टर को लेकर पीछे वाले दरवाजे से निकल ग ई. राकेश ने जीते हुए योद्धा की तरह अपनी बाईक को सेल्फ स्टार्ट दिया और सात सेकेंड बाद मेरी नज़रों से ओझल हो गया.

सपने में यथार्थवादी बातों को सपना बनाकर सोचते-सोचते घड़ी में दो बज गये. मैंने एकाएक सो जाना चाहा. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरी नींद ने शालिनी को किराये पर ले लिया था.अचानक मैं कब सोया, मुझे कुछ याद नहीं.सिर्फ इतना याद है कि कुल दो घंटा पैंत्तालीस मिनट बाद माँ ने मुझे उठा दिया. माँ ने हैप्पी बर्थडे कभी नहीं बोला. पर आज जो कुछ भी था, माँ को अच्छी तरह याद था.

माँ ने पापा को कुछ बताया. वे मिट्टी के गणेश की तरह भाव किये रहे. उन्होंने मुझसे कहा-

“आज स्कूल नहीं जाना”

मैंने कहा-” नहीं”

वे यथास्थिति में नहाने चले गये और माँ दौड़ती हुई उनके पीछे उनका गमछा लेकर जिसमें अब सात छेद हो चुके थे. उन्होंने नहाते-नहाते ही मुझे अपने जूते पॉलिस करने का हुक्म दिया. मैं उनका जूता पॉलिस नहीं करना चाहता था. पॉलिस करने पर उनका जूता आधा सफेद हो जाता था जिसे माँ अपने एक ज़माने पहले की ब्लाऊज से रगड़कर काला करने की बेवकूफाना कोशिश करती. वे जैसे ही नहाकर आये, उन्होंने मुझे लताड़ा की पॉलिस का रंग चढ़ा नहीं. अगले सात मिनट में वे खाना खाते हुए कपड़े पहनकर एक मटमैला बैग लेकर निकल गये. मैंने मन ही मन उनके जूते को हज़ारों गालियाँ दी और उसके मर जाने तक की नृशंस कठोर कामना की.

पापा पीछले बीस सालों से एकाएक सुबह ऐसे ही गायब हो जाते और रात को ठीक न्यूज़ आवर डिबेट की तरह आ जाते थे. एक दो घंटे बाद अस्त-व्यस्त होकर सो जाते. शायद ऐसे ही किसी अस्त-व्यस्त वक़्त में दोनों ने मिलकर सोनम और मेरी पैदाईस की नींव रखी होगी.

मैं उस दिन स्कूल नहीं गया और दिनभर मल्लिका और मनीषा की कहानियाँ पढ़ता रहा.ऐसी हज़ारों कहानियाँ थोक भाव से रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस के सामने मिल जाया करती हैं. मैंने सारी कहानियों को क्रमबद्ध पढ़कर फाड़ दिया. मुझे अक्सर डर लगा रहता की अगर ऐसी कहानियाँ सोनम को मिल जाये तो वह भी पढ़ने लगेगी. सोनम मुझसे सत्रह महीने बड़ी है. पर वह हर अच्छे-बुरे काम मेरे बाद ही किया करती. सिवाय इसके की वह मुझसे पहले जवान हो ग ई थी, ऐसा मैंने माँ को कहते हुए सुना था. भले ही वह जवान हुई हो या न हुई हो, पर वह मुझसे पहले समझदार जरूर हो ग ई थी. मध्यमवर्गीय घरों की लड़कियाँ अक्सर ही जल्दी समझदार हो जाती हैं. कुछ सालों पहले तक हमदोनों साथ-साथ खेला करते थे. मैं घर में चड्डी पहनकर ही सोनम से रेस लगाया करता जिसमें वह हरदम ही हार जाती, कभी-कभी तो जानबूझकर भी. फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ की वह एकाएक जवान हो ग ई और हमदोनों के बीच की दूरियां भी जवान हो ग ईं. मैंने फिर चड्डी पहनकर सोनम के साथ कभी रेस न कर सका. और सोनम की वजह से मेरे ओलंपिक की तैयारी भी अधूरी रह ग ई.

मैंने उन कहानियों को इसलिए भी फाड़ दिया क्योंकि मैंने कुछ दिनों पहले सोनम को कुछ लड़को से बात करते हुए देखा था.

रात को आठ बजते ही पापा किसी स्वचालित यंत्र की तरह आ गये. आकर सबसे पहले उन्होंने मुझे पुकारा. मैं आधे मन से उनके पास गया. उन्होंने मेरे लिए कुछ कलाकंद लाये थे जिन्हें खाकर मैंने यह निष्कर्ष निकाला की आधे-धंटे बाद यह खाने लायक नहीं रहेगा. मुझे पता था की एक बचे हुए कलाकंद को सोनम आधे घंटे बाद खायेगी. मैंने देखा की पापा ने अपने लिए नये जूते खरीद लाये हैं. ऐसे जूते जिसे आज़ाद भारत का हर क्लर्क पहनकर अपने दफ़्तर जाया करता है.

शालिनी की यादों ने मुझे स्कूल तक न जाने दिया.अचानक एक दिन मैं अपनी ही गलती के चलते स्कूल चला गया. पहली क्लास हिस्ट्री की थी जिसमें मेरी रूचि उतनी ही थी जितनी की मेरे दोस्तों की राज श्री के किसी फिल्मों में. टीचर ने 1916 का माहौल बना दिया. कि कैसे नरम और गरम दल कांग्रेसी एनी बेसेंट के नेतृत्व में स्वराज के लिए एकजुट हो गये थे. शालिनी हमारे स्कूल की सबसे खूबसूरत लड़की, मेरे क्लास में भी दो गुट था. दोनों गुटों में तमाम अंतर्विरोध के बावजूद भी शालिनी सौंदर्य को बचाये रखने के लिए प्रचुर मात्रा में एकता थी. हिस्ट्री टीचर ने मुझसे एक सवाल किया जिसका मैंने पूर्ण विश्वास के साथ गलत जवाब दिया. टीचर ने मुझे फेल करने की दो-चार कसमें खाते हुए क्लास से विदा लिया.

मेरी ज़िंदगी सही पटरी पर दौड़ रही थी की अचानक से दो ट्रेनों की टक्कर हो ग ई. वसंत की एक शाम जब मुझे पहली बार फिज़िक्स से प्यार हुआ था, जब मैंने पहली बार समझा था की सेब को ऊपर उछालने पर भी वह नीचे ही क्यों चला आता है. ठीक जब मैंने किताब बंद किया तो देखा की राकेश दौड़ा-दौड़ा पहली बार मेरे घर आया था. कुछ मिनटों बाद किसी खबर को सुनकर पहली बार मैंने अपनी माँ को बेहोश पाया. पापा ट्रेन से गिरकर अस्पताल के किसी बेनाम बिस्तर पर अपनी न ई ज़िंदगी में रच-बस जाने की कोशिश कर रहे थे. डॉक्टर ने मुझे दिलासा दिला दिया था की पापा का आधा दिमाग हमेशा के लिए बैठ गया था जिसे मैं अपनी माँ को कभी नहीं समझा पाया.इस घटना के बाद भी पापा अवैतनिक व्यक्ति के स्तर तक नही आ सके थे. घटना के बाद पापा में क ई कालजयी परिवर्तन आये जिसे हमसब ढ़ो ही सकते थे बस.

वे माँ को देखकर एक ही गाना गुनगुनाया करते-

“रिलिया बैरन पिया के लियै जाय रे”

सोनम को देखकर वे वैकल्पिक तौर पर दो ही बातें बोल पाते-

” बिटिया संस्कृति होती हैं”

” पारस पत्थर है मेरी बिटिया”.

मुझे देखकर पापा कुत्ते की तरह आवाज़ें निकाला करते जिसके चलते मैं उसी तरह घर आने-जाने लगा जिस तरह से वह आते थे पहले. मेरी माँ का मानना था कि-” जो व्यक्ति अच्छे या बुरे की खबर लाता है, वह भगवान होता है. इसीलिए मेरी माँ ने राकेश को भगवान मान लिया था.

राकेश के आने-जाने से सोनम और जवान हो ग ई थी जिसके चलते माँ को सिरदर्द रहने लगा था. रात को जब माँ मुझे खाना देने आती तो माँ से धृतमाधुरी तेल का गंध आते रहता और आँखें बीते हुए बरसात की कुछ निशान लिए रहती और पापा माँ को देखकर अपनी रेल चलाते रहते. राकेश से मुझे चिढ़ थी और सोनम से मैं नफरत भरा प्यार करने लगा. सोनम ने फिजिक्स की एक कोचिंग पकड़ ली थी. फिज़िक्स टीचर मी. रौशन के बारे में मुझे इतना ही पता था कि ‘ उसे फिज़िक्स के अलावे हर चीज आती थी.. वह अपने दिल को अपनी मुट्ठियों में रखता था और उसे कभी-कभार खोलकर अपनी कोचिंग की लड़कियों को जादू दिखाता था. ईलेक्ट्रोस्टैट चैप्टर वह लड़के और लड़कियों के उदाहरण देखकर पढ़ाता. मुझे इस बात का पता कुछ दिनों बाद पता चला की मी. रौशन राकेश का पक्का यार है. कुछ इसी तरह मैंने सोनम और राकेश को मंदिर जाते देखा जहाँ पहले वह अक्सर शालिनी से मिलता था.

मुझे पैसे की सख़्त जरूरत थी और पैसे मुझे मिलने से रहे. माँ के पास भी पैसे नहीं थे. मैं पैसों की तलाश में महीने भर भटका. किसी ने मुझे लोकेश का नाम बताया जो मेरी मदद कर सकता था. मैं लोकेश के पास गया, उसने मंदिर के एक कमरे में अपना ऑफिस खोल रखा था. उस कमरे पर उसके पुरखों ने तीन पीढ़ी पहले से कब्जा कर रखा था. लोकेश ने मुझे विडियो एडिटिंग सीखने की सलाह दी.

मैं सोनम को जवान होते नहीं देख सकता था. एक दिन मैंने राकेश को सोनम के सामने दो तमाचा दे मारा. सोनम मेरी कमजोरी को बखूबी जानती थी. उसने मेरी कमजोरी राकेश को बता दी. राकेश ने मुझे एक विडियो दिखाया जिसमें राकेश और शालिनी एक थे और शालिनी की आँखें राकेश के बदन पर थीं. मैंने वीडियो को अच्छी तरह एडिट किया.

शालिनी की माँ कुछ महीने पहले अपनी सारी पतिव्रता पर असहमती का हस्ताक्षर करके कहीं दूर चली गयी थी..और उसका बाप रूख़सत के ग़म में शराब पी पीकर हर दिन ग़ालिब और मज़ाज़ बन जाता था. जिस घर में नर राजा नहीं रहते वहाँ मादा मुखिया राज करती है. तो राकेश ने शालिनी के साथ मेरी सेटिंग कर दी. मैं शालिनी से पहले से ही बेइंतहा मोहब्बत करता था.शालिनी ने मेरे इश्क़ को कुछ हफ़्ते बाद मान्यता दी जिसके बाद हमदोनों क ई बार एक हुए. शालिनी की उपस्थिति ने मुझे अपने घर से दूर कर दिया. कुछ महीने बाद शालिनी को कुछ संदेह हुआ, जबकि मैंने तो सुरक्षा से कभी समझौता नहीं किया था.

कुछ दिनों बाद मैं एक डॉक्टर के पास गया जहाँ बहुत दिनों बाद राकेश से फिर मेरी मुलाकात हुई. मैंने राकेश के सामने योद्धा की तरह शालिनी के प्रेगनेंसी रिपोर्ट के क ई टुकड़े किये.

मैंने वीडियो एडिटिंग में महारथ हासिल कर लिया था, मैं हर किस्म के वीडियो एडिट करता था और एडिट करने से पहले वीडियो के बाजार के भाव के अनुसार ही अपने लिए भी क़िमत तय करता था.

एक दिन मैंने किसी फिल्मी जासूस की तरह एक वीडियो ढ़ूँढ़ निकाला. वीडियो में पहले मुझे एक लड़की दीखी, फिर उसका पीठ, फिर राकेश और आखिर में मैं पहली बार अपने काम का पैसा लिये बिना घर लौट आया. मैं सोनम को मार देना चाहता था. मैंने घर पहुँचते ही सोनम को एक तमाचा जड़ा जिसके बाद वह बेहोश हो ग ई. फिर पापा ने मुझे उससे अधिक जोर से एक तमाचा मारा और वह चिल्लाने लगे-

“बिटिया संस्कृति होती है”

“पारस पत्थर होती है बिटिया”

फिर उन्होंने कुत्ते जैसी क ई आवाज़ें निकालीं और आख़िर में फफककर रोने लगे. मैं उन्हें पहली बार रोते देख रहा था.

(निशांत रंजन नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में माइनिंग के छात्र हैं.  इन्हें  किस्से सुनाना पसंद है, हिंदी उर्दू के लेखकों के साथ कामु और काफ्का भी प्रिय हैं. फेसबुक पर दास्तान  लिखते हैं. )