बारिशों के जानिब

#बारिश_एक 
जैसे हर बारिश के लिए हमारे पास एक कविता होती थी,एक पेड़ होता था, एक किताब होती थी, आइसक्रीम का एक फ्लेवर होता था, एक गंध होती थी, एक डायलोग होता था, हाथ पकड़ने का एक अंदाज़ होता था, एक गाना भी होता था. 
आज बारिश है, शाम है, तुमसे बात करनी है, लम्बी वाली... कैसे बात होगी?


मुर्दों के बारे में नदी सिखा देती है. सन तेरह हमने मुर्दों को घूरते हुए बिताया. बारिश होती थी, बाढ़ आती थी, और दहते हुए मुर्दे आते थे, उनके साथ पानी पर बहते हुए कौए, एक आध बाज़, बहुत कम. मिट्टी के रंग का पानी, राख़ नदारद. ये कभी शामों को नहीं हुआ. जब हुआ दोपहरों को. तुम घाटों को एलियट सुनाती थी, फिर भी कुछ जी उठता था. काठ से सटता है पानी, फिर कई दिनों तक काठ नम रहता है. कैंटीन की बालकनी पर बैठे हुए, तुम्हारा इंतज़ार करना एक सुन्दर याद है बारिश की.
अकल्पनीय शहर,
जाड़े की सुबहों के भूरे कुहासे से ढंका हुआ
तैरती हुई भीड़, लन्दन ब्रिज पर, इतने सारे,
मैंने नहीं सोचा था, मौत ने लील लिए इतने सारे.

- एलियट, मुर्दों की अंत्येष्टि, द वेस्टलैंड.

दुनिया में जब इन्सान से पहले-पहल देखा होगा बारिशों को तो क्या सोचा होगा?पानी महसूसते हुए वो भूल गये होंगे सब घाव, मौत का पास होना, अपने सब बिछोह या छूटे हुए अपने और शिद्दत से याद आये होंगे?
रोहिणी, सेक्टर पांच में जितने कैंसर के मरीज़ रहते हैं, उतने ही मोर भी रहते हैं, तीमारदार जब सुबह सुबह अपने मरीजों के लिए कीमोथेरेपी की दवाएं लेने निकलते हैं, ये मोर किसी बालकनी, किसी खिड़की, किसी पेड़ या सड़क पर चलते हुए, उन्हें ध्यान से देखते हैं.
वो मोर भी बारिश का वैसे ही इंतज़ार करते हैं, जैसे अस्पताल में रोज़ शाम को टहलने लायक मरीज़, अपने तीमारदार के कंधे से सटे, बड़े शीशे वाली खिडकियों से इन मोरों को देखते हैं. बारिश में भींगते मोरों को देख कर बहन चिड़िया हो जाती थी.





 #बारिश_चार 
मैंने कभी बहुत पढाई नहीं की. स्कूल कभी पसंद नहीं आया. घूमना पसंद था. उनदिनों एक सस्ता वॉकमैन ख़रीदा था, एक सौ अस्सी रुपये का. एक कैसेट, मोहम्मद रफ़ी वाला, सैड सांग्स. पहला प्यार फेल हो चुका था, वो मुझसे बात करना छोड़ चुकी थी. मैंने स्कूल जाना कम कर दिया था. उस साल खूब बारिश हुई. पडोसी के पास एक बिना ब्रेक की साइकिल थी जो उधार मांग कर, सुबह मोहम्मद रफी वाला गाना सुनते, उसकी एक झलक के लिए, बस के पीछे सेंट ज़ेवियर तक जाता था.जिस दिन वो देख लेती थी, उस दिन रफ़ी चुभते थे कान में. कई बार पूरी तरह तर हुआ, कई बार पिट जाना पड़ा, केमिस्ट्री प्रैक्टिकल फ़ाइल कभी खत्म नहीं हुई (हो भी जाती तो केमिस्ट्री का क्या उखड़ जाता)...
पहले प्यार के वो आखिरी दिन थे, दिल जिसके कई टुकड़े अब खो चुके हैं, उसका पहला टुकड़ा उसी बरसात में टूटा था.








 #बारिश_पांच
वो खुशनुमा बारिश के दिन थे. पहले मुक्कमल प्यार वाली पहली बारिश. जींस के ज़माने में फूलपैंट और बूट्स के ज़माने में चमड़े की चप्पल पहनने वाला प्रेमी. ईन्फिल्ड की जगह लम्बा छाता रखने वाला प्रेमी. रोज़ सुबह प्रेमिका फिर भी गाड़ी दूर पार्क कर, सुनसान युनिवर्सिटी वाली सड़क पर मिलने आया करती थी. एक दिन खूब बारिश थी, वो नहीं आई, उसका फोन आया - "भाई को सब पता चल गया है." प्रेमी मॉल रोड वाले बस स्टैंड पर बैठा था, एक झलक देखना चाहता था, ग्वायेर हॉल में रहने वाले सीनिअर को फोन किया, कुछ बात की, फिर प्रेमिका को फोन किया - "कह देना जहाँ बुलाना है, बुला ले, जितने भी लड़के आयें, मैं अकेला आऊँगा और निहत्था."
लड़के को हिम्मत जाने कहाँ से आई. लड़की रोती हुई हँस रही थी, बारिश भी उस दिन लड़की के आँसुओं सी थी - खुश भी और उदास भी.





 #बारिश_छह 
सार्त्र को बायीं आँख से नाममात्र दिखता था. फिर भी उन्हें दूसरी बड़ी लड़ाई में सेना में भर्ती होना पड़ा.वो मौसम विभाग में काम करते थे और एक धावे में बंदी बना लिए गये.उन्हें "स्टैलग बारह" में रखा गया. पिछली शताब्दी की सन चालीस की गर्मियों के शुरुआती दिन रहे होंगे. कैम्प के पादरी ने उनसे कुछ लिखने को कहा...उन्होंने "बरिओना " नाम का एक नाटक लिखा. इसका हीरो एक यहूदी था जो रेजिस्टेंस के लिए काम करता था. 
फ़्रांस के कई हिस्सों में साल में कभी भी बारिश होती है. शमशान के शवदाह गृह के बाहर खड़े होकर अगर सूंघने की कोशिश करें तो पता चलता है कि राख़ और बारिश मिलकर कितनी परमानेंट गंध को जन्म देते हैं...इस से थोड़ी ही अलग एक बहुत ज्यादा मीठी गंध कब्र में लाश सड़ने के बाद, कब्रिस्तानों को बारिशों में मिलती है.हो सकता है सालों तक वो महक आपका पीछा करे.
एक ऐसा आदमी जो मानता था कि जीवन में कुछ भी करने का कोई मतलब नहीं, उसने बरिओना लिखा और थंडर के बेटे की बात की.
जब भी मुझे सार्त्र के पास जाना पड़ा, हरदम वही नाउम्मीदी और बेचैनी मिली. अनिश्चय से कितनी कितनी बारिश वाली रातों को हम साथ जूझते हैं.
उस बारिश में क्या हुआ होगा ? फिर कभी सार्त्र और मार्क्स इतने पास नहीं आये.
उस बारिश में "द बीवर" के लिए मिट्टी में उम्मीद उगी थी.




अंचित. 
(अंचित कवितायेँ लिखता है.)