बैठक : भीष्म साहनी चैप्टर.

लेखक साहनी की तस्वीर के साथ. तस्वीर रवि ने बनाई
कल भीष्म साहनी को गये चौदह साल हो गये, तमस की पृष्ठभूमि आज़ादी के समय की हैं, उनकी कहानियाँ विभाजन और फिर नेहरु राज के डिसइल्यूजनमेंट की बात करती हैं - प्रतिरोध का भार हिंदी भाषा में उनके कंधे भी रहा है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि अभी आज क्या भीष्म साहनी को याद करना और उनके लिखे को दोहराना पढना क्यों ज़रूरी है? क्या ये बस एक परंपरा है कि उनको भी लेखक-संस्कृतिकर्मियों का तबका याद करे और फिर आगे बढ़ जाए?

"बैठक" पाटलिपुत्रा कॉलोनी के एक अपार्टमेंट में होती है, जिसमें विभिन्न विषयों से जुड़े लोग एक साथ बैठक करते हैं, औपचारिक नहीं है और विषय आकाश के नीचे और धरती के ऊपर कुछ भी हो सकता है. इसका आयोजन अमिताभ करते हैं.
शहर में छोटे छोटे ऐसे कई केंद्र अब वर्किंग हैं, जो अंतत: शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक मज्जा का पोषण कर रहे हैं. "बैठक" भी इनमें अपनी जगह बना रहा है.
 
तो कल भीष्म साहनी को याद किया गया. उनकी दो कहानियाँ, "अमृतसर आ गया" और "गंगो का जाया", का पाठ हुआ जो क्रमश: विनोद कुमार और अमिताभ ने किया. रवि ने साहनी जी की कहानियों के ऊपर सुन्दर तसवीरें बनाई  और लगाई थीं. विनोद कुमार जी ने "माधवी" नाटक की कहानी भी सुनाई.

वापस उस प्रश्न की ओर लौटें कि क्यों ज़रूरी हैं, भीष्म साहनी? साहनी से पहला परिचय स्कूल में हुआ था. अंतर-स्कूल निबंध प्रतियोगिता में पहले इनाम के तौर पर उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन मिला. तब से साहनी जी को थोडा इधर थोड़ा उधर पढता रहा. बैठक में भी ये सवाल मौजूद रहा.

विभाजन के समय जो दंगे भड़के, धार्मिक उन्माद उनका एक महत्वपूर्ण ड्राइविंग फ़ोर्स रहा. उस समय भी सरकारी तंत्र और सहकारी संस्थाओं ने एक ऐसा वातावरण बनाया जिसका परिणाम कुछ और नहीं हो सकता था. साहनी ने इन दंगों को, विभाजन के दंश को करीब से देखा और बहुत अन्दर तक जाकर उसकी परतें खोजने का प्रयास किया. उनकी कहानियां, उनके उपन्यास, दरअसल भारत की साइकी की जांच-पड़ताल भी है.

आज के समय में वापस उनतक जाना, माहौल में पनपती "हेट-मोंगरिंग" और उसके पीछे चल रहे षड्यंत्र को समझ पाने की तरफ का रास्ता हो सकता है.  इसीलिए साहनी बहुत प्रासंगिक हो जाते हैं.

अगर उनकी कहानियों के पाठ के बाद सन्नाटा होता है, शब्द गुमते हैं तो फिर ये सन्नाटा आपसे आपके आदमी होने की गवाही भी मांगता है - तो आज के भारत की भीड़ हो या असंख्य मीडियाकर्मी जो फेक न्यूज़ के लिए काम करते हैं या हम और आप , सबको ये गवाही देनी होगी.

अंचित
(अंचित कवितायें लिखता है)