युवा कविता #2 : शशांक मुकुट शेखर

 मेरे लिए कविता खुद को ढूंढने का एक माध्यम है. और उन सभी बातों को व्यक्त करने का भी जो मेरे अंदर पलकर मुझे बैचैन सी करती रहती है. कविता मेरे लिए आत्म-संतुष्टि है. और खुद को एक बेहतर इंसान बनाने का बहाना भी. कविता मुझे संपूर्ण बनाती है.अपनी लिखी हरेक कविता मेरे लिए मेरी प्रेमिका की एक चुम्बन है, जो हमेशा मुझमें प्यार को और थोड़ा गहरा कर जाता है.


रुखसाना 1. फ़ज़र की पहली अज़ान के साथ तुम याद आती हो रुखसाना अब मेरी नींद सुबह जल्दी नहीं खुलती तुम्हारे घर से आने वाली चाय की महक मुझतक पहुँच ही नहीं पाती जैसे रुक जाती है श्लोक की ध्वनि मस्जिद के दरवाजे तक जाते-जाते और जैसे पहुँच ही नहीं पाती कभी अजान की आवाजें मंदिर के कपाट तक पहले हर सुबह तुम पढ़ती थी कलमा और बज उठती थी मेरे कमरे के कोने में बनी मंदिर की घंटियाँ गुजरात के रास्ते तुम ना जाने कहाँ गुम हो गई और मैंने तुम्हारा नाम पिरो रखा है अपने श्लोक में जिसे जपता हूँ काबा की सीढियों पर लिखे आयत की तरह 2. पता नहीं तुम कहाँ हो रुकसाना मैं अब भी यहीं हूँ, इसी शहर में अब सबकुछ वैसा तो नहीं है, पर सबकुछ वही है मेरा यकीन करो सबकुछ वही है, वहीँ है वही शहर, वही लोग बस तुम नहीं हो हाँ.. और कुछ भी नहीं है मेरी चाय में अब मिठास नहीं है शहर की हवा में तुम्हारे कलमें की आवाजें नहीं गूंजती रातें अब भी काली ही होती है पर दिन भी अब काला-काला होने लगा है नफरत और तल्खियों के साए में लिपटा डरवाना काला दिन करीम मियां और रमुवा अब गले नहीं मिलते मोहसिना और महेंद्र अब साथ नहीं पढ़ते मजहब ने ज्ञान के भी अब हिस्से कर दिए हैं यहाँ शहर की मस्जिदों में आज भी रोज अज़ान होता है आज भी जलते हैं दिए यहाँ के मंदिरों में पर हां, पंडित भोलाराम और मौलवी रहमान अब दोस्त नहीं रहे तुम्हारे जाने के बाद पता चला कि मजहबें जोडती नहीं अलगाव पैदा करती है यह शहर अब वो शहर नहीं रहा जहाँ आयतें और श्लोक साथ पढ़े जाते थे 3. पता है रुकसाना, शायद हम गलत थे हमें समझना चाहिए था कि ना राम से तुम्हारा कोई वास्ता ना अल्लाह पर मेरा कोई अधिकार ये धर्म ये कौम ये मजहबी सियासतें इनसब ने बना रख्खे हैं तमाम रुखसानाओं और रह्मानों और रोहितों और राहुलों के लिए एक अलग-अलग तीर्थ स्थल जहाँ प्रवेश करने लिए बनानी पड़ती है दोनों हाथों से भिन्न-भिन्न मुद्राएँ हम क्यों नहीं समझ पाए कि मंदिर के ‘म” और मस्जिद के ‘म’ में बहुत फर्क है और राम का ‘र’ और रहीम का ‘र’ दो अलग-अलग वर्णमाला के ‘र’ हैं शायद मुझे पक्का यकीन है कि तुम्हारा नवरात्रा का व्रत रखना गलत था या मुझे रमजान में रोजा नहीं रखना चाहिए था 4. कभी-कभी सोचता हूँ आकर लेट जाऊं तुम्हारे बगल में किसी दिन पर वो भी संभव नहीं क्योंकि मेरा ईश्वर मुझे लेटने का अधिकार नहीं देता और तुम्हारा खुदा.... खैर छोड़ो पर हम मिलेंगे हम जरुर मिलेंगे सुना है जन्नत और स्वर्ग एक ही जगह का नाम है या शायद वो भी अलग-अलग.. पता नहीं पर इस ब्रह्मांड के परे कोई तो जगह होगी कोई तो ऐसा शहर होगा जहाँ अल्लाह और राम साथ रहते होंगे हम वहां मिलेंगे पर हम मिलेंगे जरुर तुम इंतजार करना. ------------------------ किसी दिन लिखूंगा तुमपे एक लम्बी कविता जिसमे पाकिस्तान से लेकर गुजरात तक का जिक्र होगा और फिर कोई रुकसाना गुजरात के रास्ते कहीं गुम ना होगी.


             मैंने किया था प्यार 

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मैंने किया था प्यार शहर के पुराने हिस्सों की छांव तले ओढ़नी के झुरमुट में गुपचुप मीर के गजल सा प्यार पुरानी खिडकियों के साए में बेखबर.... नालंदा के बसे खंडहरों से तक्षशिला के रंगीन उजाड़ों तक अमलतास के पीले फूलों सा प्यार क्या तुमने पाटलिपुत्र के गौरव अतीत सा किया है कभी प्यार? किया है कभी मगध के अदृश्य सूर्योदय की लालिमा सा? उस रात जब हस्तिनापुर नष्ट हो रहा था गंगा का पानी गायब होता है जैसे अचानक गर्मियों में ग़ालिब की नज्म सा गुनगुना मैं मशगूल था रचने में एक नया हर दफा एक नयी सभ्यता की शुरुआत किसी पुराने बसे परम्पराओं के खात्मे के साथ होती है और प्यार ही उस नयी सभ्यता को बसाती है उसी जतन से जैसे माँ नवजात को अपने स्तन की नमी से सींचकर जैसे धरती किसी बीज को बादलों से मांगकर दो बूंद शहर के सारे पुराने हिस्से गायब होते गए एक-एककर ओढ़नी के रंगीन रेशों सा हवा में दूर,बहुत दूर तक पर जीवित है अब भी तक्षशिला और सांसें ले रहे हैं नालंदा की मटमैली दीवारें ये प्यार ही है जिसने बचा रखा है पाटलिपुत्रा को और मुझे भी प्यार ने ही बचाए रखा है अबतक अमलतास के पीले फूलों सा फिजाओं में दूर तक फैले हुए.

 
 
संवाद


हमेशा से हमारी चाह रही है द्विपक्षीय संवाद की
जहाँ हम सिर्फ सुनें नहीं
हम सुने भी जाएं

मैं अक्सर एकांत में
फेंकता हूँ एक ढेला
अपने विचारों में तल्लीन शांत जल में
पानी हमेशा आपके सवालों का जबाब देता है
हमें बस उनमें उठी तरंगों की भाषा समझना भर है

संवाद के पूरा होने के लिए
दोनों पक्षों का पूर्ण वक्तव्य कतई जरुरी नहीं
कई दफा अपूर्ण संवाद भी
संवाद के पूरा होने का कारण बनती है

अपूर्णता संवाद को एक नया अर्थ प्रदान करती है

जैसे
जब वह जाते वक़्त आपसे कहता है
"अपना ख्याल रखना"
इसका साफ़ मतलब है कि
वह जल्द ही आपसे मुलाकात चाहता है

अपूर्ण पूर्ण संवाद का सबसे अच्छा उदहारण है माँ

माँ का यह कहना कि 'अभी तुम बच्चे हो'
कहीं से भी आपको बच्चा साबित नहीं करती
दरअसल माँ ने देखा है
कई बच्चों को बड़ा होते हुए
इसलिए वो आपको हमेशा बच्चा ही देखना चाहती है

संवाद को हमेशा माँ की दृष्टि से देखा जाना चाहिए
और हर संवाद को
एक अदद माँ की आवश्यकता होती है.