पढ़ते हुए : वोल्गा से गंगा - सुधाकर रवि

 
 
 
 
करीब दो महीने पहले की बात है,  मन बना कि शरतचंद्र का उपन्यास चरित्रहीन पढ़ लिया जाये, किताब जुगाड़ में अपने शहर के छात्र संगठन डी.एस.ओ की लाइब्रेरी में गया, वहां किताब इधर-उधर देखने के बाद चरित्रहीन नहीं मिला, उसकी जगह दिख गयी वोल्गा से गंगा. लगा कि यह किताब अब तक पढ़ ली जानी चाहिए थी, अब तक नहीं पढ़ पाने का मलाल था सो उसी अफ़सोस में वोल्गा से गंगा ले आया. 


पढ़ने से पहले अब तक लग रहाथा कि वोल्गा से गंगा दूसरे उपन्यास की ही तरह होगा , लेकिन यह 20 अलग अलग कहानियों की किताब है, जो प्राय एक दूसरे से सम्बंधित नहीं है और हर कहानी बड़े समय अंतराल से भी विभाजित हैं. आदिम साम्यवाद से शुरू हो दास युग , सामंत युग , मुग़ल काल , ब्रिटिश काल से होकर समाजवादी रूस तक की कहानी इसमें संकलित हैं. जो नए कथ्य और तथ्य , दोनों को खोलती हैं.या यूं कहें की यह किताब अँधेरे और प्रकाश के बीच खिचे दीवार में खिड़कियों की तरहहै , और इस दीवार में कहानी रुपी बीस खिड़कियाँ हैं. एक खिड़की रूस के जंगलों में खुलती है, तो एक खिड़की हिल्सा (पटना ) के एक गाँव में , एक खिड़की से बाणभट दिखाई देते हैं दुसरे खिड़की से कार्ल मार्क्स, एक खिड़की से मुग़ल दरबार दिखता है तो , एक खिड़कीसे तक्षशिला का प्रांगण. और जब एक-एक कर सारी खिड़कियाँ खुल जाती हैं तो अँधेरे और प्रकाश के बीच खड़ी दीवार टूट जाती है, और पाठक के सामने होता है नए ज्ञान का प्रकाश पुंज.


       वही कोई फ़िल्मकार इस किताब को पढ़े तो येकहानियां उसे बीस शार्ट फिल्मों जैसी लगेगी, जो खुद में भी मुक्कमल है और जो हर बार एक नई दुनियां एक्स्प्लोर करती जाती हैं. वहीँ अगर बीसों को एक साथ जोड़ दे तो सतत और व्यापक फिल्म बन जाये.
                ये बीस कहानियाँ 6000 ईसा पूर्व से शुरू होकर सेकंड वर्ल्ड वॉर तक की हैं। रूस के पहाड़ों से बहती हुई वोल्गा नदी के साथ कहानी, तजाकिस्तान , ईरान , पामीर , तक्षशिला ,काशी, मगध होते हुए बंगाल की खाड़ी में समाप्त होती है। शुरू कि चार कहानियाँ प्रागैतिहासिककाल की हैं , जिसमें जंगलों के दृश्य, बर्फ, नदी और आदिम संस्कृति को पढ़ते हुए उस वातावरण से धीरे धीरे एक सम्मोहन सा हो जाता है। दृश्यआँखों के सामने तैरने लगते हैं मानो कोई किताब न पढ़ के सिनेमा हॉल में कोई फिल्म देख रहे हो। सामाजिक दृष्टिकोण से यह चारों कहानियां महिला प्रधान समाज कि कहानी है. किताब के अंत में भदंत आनन्द कौसल्यायन लिखते भी हैं कि यह चार कहानियां एंग्लेस कि Origin of family private property and state के लिए प्रवेशिका हैं.  


किताब की हर कहानी का शीर्षक उसके खास किरदार के नाम पर है जिसके आस-पास घूमती है, जिसमे इतिहास और fiction का मेल है. इन बीस कहानी  में हर पाठक के लिए अलग अलग कहानी प्रभावशाली लगेगीं लेकिन, पढ़ते हुए मुझे दो कहानियाँ बहुत ज्यादा प्रभावशाली और नए तथ्य को कहने वाली लगी. सातवें और आठवें चैप्टर में राहुल सांकृत्यायन  ईश्वरीय अवधारणा , पुनर्जन्म और जातीय श्रेष्ठता को कल्पना जनित बताया है. ईश्वरीय अवधारणा कोराजा-पुरोहित-क्षत्रिय को बाकि के समाज पर शासन करने का जरिया बताते हैं.पुनर्जन्म और पाप-पूण्य को गुलामी और जातीय श्रेष्ठता को युगों युगों तक प्रमाणितऔर खंडित होने से बचाए रखने के लिए बनाया गया है. इन दो चैप्टर को पढ़ते हुए लगा कि भारत जैसे दकियानूस समाज में यह किताब कैसे इतने सालों से पढ़ीं जा रही है इस पर बैन कैसे नहीं लगाया गया, निश्चित ही यह राहुल सांकृत्यायन  की विद्वता और तथ्यों को प्रमाणिकता है जो अब तक पढ़ी जा रही है. 


दूसरी कहानी जो आज के समयमें सबसे ज्यादा प्रासंगिक है. प्रसंग है गौ हत्या का. अभी के समय में गौ हत्या के नाम पर कानून अपने हाथ में ले सामूहिक हत्या की खबरें आम होती जा रही है. देश में यह माहौल बनाया जा रहा है  कि गाय खाने वाले लोग या समूह दोयम दर्जे के हैं उनकीराष्ट्रीयता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. वोल्गा से गंगा पढ़ते हुए लगा कि यह बखेड़ा कोई नया नहीं है. राहुल सांकृत्यायन उन प्रसंगों में लिखते हैं कि प्राचीन भारत में ब्राह्मण अतिथि के सत्कार में गोमांस पकाया जाता था और इस प्रसंग का उल्लेख महाभारत में भी है.


वोल्गा से गंगा में एकप्रसंग में पढ़ने को मिला कि बौद्धों को ब्राह्मण जबरदस्त प्रतिद्वंदी समझते थे,वह जानते थे की सरे देशों के बौद्ध गोमांस खाते हैं जिसे वह नहीं छोड़ेंगे इसलिएइन्होने भारत में धर्म के नाम पर गोमांस वर्जन – गो ब्राह्मण रक्षा का प्रचार शुरूकिया, बौद्ध जाति–वर्ण भेद उठाना चाहते थे.


बौद्ध धर्म के लोग औरब्राह्मण लोग गोमांस खाते थे लेकिन अपने खत्म होते धर्म और अपने आराम को बचाने केलिए ब्राह्मण गो हत्या को रोकने और शुद्धता का माहौल खड़ा किये, गाय से इनका कोई  मतलब नहीं.


आज के समय देखें तो यहपूरी घटना और प्रसंग इस्लाम के आने के बहुत पहले की है.  लेकिन इस्लाम से अंध विरोध के कारण इस्लाम को बाहरी और मुस्लिम को दोयम नागरिक साबित करने के लिए गो हत्या माहौल बनाया जा रहाहै. एक समूह गोमांस खाना छोड़ भी दे, एक रंग में देखने वाले इन लोगों की नफरत खत्म नहीं होने वाली, इनका विरोध उस पूरे समूह से है.

इन दो प्रसंगो के जैसी ही अन्य कहानियां भी नए तथ्य को सामने रखती हैं , जिससे पन्ना दर पन्ना कुछ नया सीखता गया और शायद ही कोई पाठक होगा जिसे यह किताब प्रभावित न करेगी. निश्चित ही मेरे जैसे नए पाठकों के लिए राहुल सांकृत्यायन का  आगे के जीवन पर गहरा प्रभाव रहेगा.

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बुद्धि के भी ऊपर पोथी को रखना, संसार के कर्ता ईश्वर को मानना , स्नान करने के धर्म की इच्छा , जन्म-जाति काअभिमान , पाप नाश करने के लिए शरीर को संतप्त करना अक्ल मारे हुओं की जड़ता के येपांच लक्षण हैं.

- इसी किताब से
 
 
(सुधाकर साहित्य पढता है और कवितायेँ लिखता है)