पढ़ते हुए : गुनाहों का देवता - शुभम

'गुनाहों का देवता'। जब पहली बार नाम सुने तो बड़ा अजीब लगा था, किसी उपन्यास का ऐसा नाम होने का क्या मतलब है? लेकिन जब दोस्तों ने कहा कि यह एक कालजयी उपन्यास है जिसके लेख़क हैं - धर्मवीर भारती।  क्रिकेट देखने का भूत उतरने का बाद, किताबें पढ़ना मेरे लिए एक नई आदत बन गयी है। यह किताब मुझे एक समीक्षा के बदले हिन्द युग्म से ईनाम में मिली थी। उत्सुकता तो थी लेकिन किताब शुरू नहीं कर पा रहे थे। लेकिन जब पटना बुक क्लब की मीटिंग में इसे जुलाई के रीडिंग लिस्ट में शामिल किया तो मेरे भी इंतज़ार खत्म हुआ और 'गुनाहों का देवता' पढ़ना मैंने शुरू किया। इसे पढ़ने के दौरान न जाने कितना ख्याल और विचार आते-जाते रहे और मेरे साथ ऐसे पहली बार हो रहा था। वैसे मुझे जल्दी पढ़ने की आदत तो नहीं है फिर भी मैंने तीन दिनों में इसे पढ़ लिया।

जो लोग यह उपन्यास पढ़ चुके हैं वेलोग तो बस नाम सुनते ही न जाने इसकेे बारे में कितनी बातें कहने को बेचैन हो जायें। और, उनके आंखों के सामने सुधा, चन्दर, पम्मी, विनति, गेसू, डॉ शुक्ला जैसे मुख्य पात्र तैरने लगेंगे और मन में उनके सभी संवाद गूंजने लगेंगे। इस किताब की एक खासियत यह भी है कि जो इसे पढ़ लेता है वो आसानी से कोई भी चीज भूल नहीं पता है। दरसअल इस किताब को पढ़ लेने के बाद भी ऐसा लगता है कि इसकी कहानी अभी भी जारी है किसी न किसी के जीवन में या आने वाली है कभी हमारे सामने भी ऐसी ही कोई कहानी।

धर्मवीर भारती ने एक साथ कई बातें कह दी है इस एक कहानी के जरिए और एक कड़वी सच्चाई भी हम सबके सामने लाते हैं की जिंदगी में प्रीत से बढ़ कर कोई चीज नहीं हो सकती है। इसके साथ ही उनकी किताब कई कठिन सवाल भी करती है। जैसे - क्या प्यार का मतलब सिर्फ अपनी खुशी होती है? क्या जरूरी है कि पुरुष और नारी के दोस्ती का संबंध शारीरिक ही हो? क्या एक लड़का-लड़की का प्यार शादी और उसके बाद घर बसाने तक ही सीमित होता है? किताब खत्म करने के बाद भी मैं इन्हीं सवालों में उलझा रहा। जैसा कि आज ज्यादातर देखने को मिलता है जहां प्यार का मतलब सिर्फ शारिरिक सुख से होता है। क्या यही सच है या फिर आज के जमाने में कुछ लोगों ने अपने प्यास का नाम प्यार दे दिया है!

कहानी में मुख्य पात्र सुधा और चन्दर भी गहरे अंतद्वद्व के बावजूद भी शायद ही इन सभी सवालों के जवाब समझ पाते हैं। इन सब के अलावे धर्मवीर भारती के इस किताब से और भी बातें निकल कर आती है। जैसे विवाह के बाद जो परेशानी किसी लड़की को झेलनी पड़ती है वो सचमुच दर्दनाक है। अपने माँ-बाबा के दुलार में पलने के बाद जब जिंदगी की असली सच्चाई से उनका सामना होता है तो उनको उसके लिए कितना मजबूत बनना पड़ता है। और एक विवाह रिश्तों में तो परिवर्तन लाता ही है साथ ही साथ  जिंदगी की लहरों में उथल-पुथल भी मचा देता है और इसके प्रभाव दोनों घरों में एक अलग ही परिवर्तन लाता है।

इस लोकप्रिय किताब पर अगर चर्चा हो तो बहुत सारी बातें कहीं और समझी जा सकती है। मैंने कुछ बातें आपलोगों के सामने लाने की कोशिश की है। आप भी कुछ कहें। इसका नाम 'गुनाहों का देवता' क्यों है इसको जानने के लिए आप इस किताब को जरूर पढ़ें, अगर नहीं पढ़े हैं तो।


"शरीर की प्यास भी उतनी ही पवित्र और स्वाभाविक है जितनी आत्मा की पूजा। आत्मा की पूजा और शरीर की प्यास दोनों अभिन्न हैं। आत्मा की अभिव्यक्ति शरीर से है, शरीर का संस्कार, शरीर का संतुलन आत्मा से है। जो आत्मा और शरीर को अलग कर देता है, वही मन के भयंकर तूफानों में उलझकर चूर-चूर हो जाता है।"
- उपन्यास में से संवाद का एक अंग।

(शुभम लेख लिखता है और किताबों के बारे में काफी बात करता है.)