रेखना मेरी जान और रत्नेश्वर - सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स से बातचीत.

पटना पुस्तक मेला में अपने नए उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ के लिए प्रकाशक के साथ पौने दो करोड़ रुपये का करार के घोषणा के बाद रत्नेश्वर सिंह देश स्तर पर चर्चा में आए हैं, अपने आगामी नॉवेल ‘रेखना मेरी जान’ पर इन्होने बातचीत की है सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स के साथ . बातचीत के प्रमुख अंश -
सवाल - रेखना मेरी जान का कथानक किस विषय पर है ?
जवाब - इसका कथानक ग्लोबल वार्मिंग पर है जो एक प्रेम कहानी के साथ पैरेलल चलती है और इसका कथानक युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया है.
सवाल - पॉपुलर लिटरेचर में कॉलेज, हॉस्टल, इंजीनियरिंग जैसे विषयों पर किताब लिखी जा रही है ताकि यूथ तक पहुँच पाएं, आप यूथ तक पहुँचने के लिए ग्लोबल वार्मिंग जैसी विषय को क्यों चुनते हैं ?
जवाब - ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी समस्या है और इस विषय पर हिंदी में कोई किताब नहीं आई है, तो हमें लगा कि इस विषय पर युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा जाना बेहद जरुरी है , ताकि आज का युवा इस समस्या को महज किताबी या इसे खबर की शक्ल में न जाने , बल्कि भावनात्मक रूप से इस समस्या से जुड़ पाएं.
सवाल इस किताब की भाषा शैली कैसी है, क्या परम्परागत हिंदी लेखन जैसी है या कुछ नयापन है ?
जवाब - किताब की भाषा यूथ को ध्यान में रख कर लिखा गया है, आम बोलचाल वाली भाषा है, देवनागरी के साथ रोमन शब्दों के भी प्रयोग है. जिसे से आज की जनरेशन आसानी से जुड़ पाएं.
सवाल ग्लोबल वार्मिंग एक व्यापक विषय है जिससे हर एक देश प्रभावित है, ऐसे में इस नॉवेल को किस शहर या देश को केंद्र में रख कर लिखा गया है ?
जवाब - ग्लोबल वार्मिंग से सबसे पहले सागर तटीय देश प्रभावित होंगे , इसे लिहाज़ से मैंने इस किताब को बांग्लादेश को केंद्र में रख कर लिखा है. आप किताब में देखेंगे कि हिंदी का आलावा किताब में बांग्ला भाषा का भी प्रयोग है.
सवाल – रेखना मेरी जान की दस लाख प्रति बेचने का नोवेल्टी प्रकाशन ने लक्ष्य रखा है, हिंदी में इतनी प्रतियाँ बेच पाना क्या आपको असंभव नहीं लगता ?
जवाब – यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी वर्दी वाला गुंडा की लाखों प्रतियाँ बेची जा चुकी हैं. लोग ऐसा पहले भी कर चुके हैं, यह कोई अद्भुत बात नहीं है. मैं ऐसा काम नहीं करने जा रहा जो पहले न हुआ हो.
सवाल – (टोकते हुए ) फिर आज के समय में किस आधार पर लाखों प्रतियाँ बेच पाना संभव है ?
जवाब – हमारे प्रकाशक ने सबसे पहले कई सर्वे का अध्ययन कर के पता लगया की हिंदी के पाठक हैं कितने. हमें यह ज्ञात हुआ कि लगभग 5 करोड़ लोग हिंदी के अखबार पढ़ते हैं. मतलब हिंदी के पाठक तो है और खास स्ट्रेटजी के साथ बाज़ार उतरें तो 10 लाख किताब बेची जा सकती है. यह योजना इसी संख्या को ध्यान में रख कर के है.
सवाल – हिंदी के लेखक और प्रकाशक और अंग्रेजी के लेखक प्रकाशक ने आप क्या अंतर देखते हैं ?
जवाब – हिंदी के लेखक और प्रकाशक दो धरातल पर खड़े हैं , लेखक को प्रकाशक से कोई मतलब नही है, और प्रकाशक को लेखक से कोई मतलब नहीं. लेखक का काम लिख देने भर से हैं और प्रकाशक का काम किताब छाप कर पूंजी निकाल लेना है बस. दोनों में कोई तारतम्य नही होता कि हमारी किताब कैसे बिके. हिंदी का दुर्भाग्य है कि इसका बाज़ार खड़ा नहीं है. जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, उसका बड़ा बाज़ार है, किताब आने से पहले उसका बाज़ार देखा जाता है, कई एडिटर बैठते हैं, मार्केट स्ट्रेटजी तैयार की जाती है. हिंदी को बेचना आसान होना चाहिए लेकिन इस पर काम ही नही हुआ है, ऐसा हमें लगता है. हिंदी के अखबार और अंग्रेजी के अखबार से कई गुना ज्यादा बिकती है या यूं कहें कोई तुलना ही नही है. मतलब की हिंदी के पाठक हैं लेकिन आपने खड़ा नही किया साहित्य पढ़ने के लिए , आप पहुँच नहीं पाएं. लेखन का काम सिर्फ लिखना नहीं है , मैं कोई चुनौती नहीं दे रहा लेकिन मेरा प्रयास है इसका बाज़ार दिखाऊं, इसका बाज़ार खोलूं.
सवाल – ‘रेखना मेरी जान’ के बाद हिंदी का बाज़ार कितना बदल पायेगा ?
जवाब – एक लेखक से पूरे समाज में बदलाव आ जायेगा ऐसा नहीं है , मेरी किताब के 10 लाख कॉपी बिक भी गयी तो कोई बहुत बड़ा भूचाल आ जायेगा , ऐसा नहीं है. इसके लिए निरंतर सभी को प्रयास करना होगा तभी वो बदलाव आएगा . एक चेतन भगत की किताब बिक गयी तो कहाँ अंग्रेजी के दुसरे लेखकों की किताब उतनी बिक पाती है. लेकिन हाँ हमारे इस कदम से साहित्य जगत सोचेगा, उन्मुख होगा.
सवाल – पटना पुस्तक मेला से जुड़े आप अपने अनुभव बताएं ?
जवाब – पुस्तक मेला में मेरी शुरुआत बतौर लेखक हुई. 1990 में मैं अपनी किताब खुद खड़े होकर बेचता था. लोग हँसते भी थे कि कैसा लेखक है जो खुद अपनी किताब बेच रहा है. 1996 में पटना पुस्तक मेला समिति में एक सदस्य के रूप में शामिल हुआ , फिर पटना पुस्तक मेला का प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुआ. उस समय मेला में राजनितिक वर्चस्व था, हमने इसे थोड़ा साहित्य संस्कृति और पत्रकारिता का केंद्र बनाने की कोशिश की. उस समय बिहार में कोई साहित्यिक केंद्र नहीं था , कई केंद्र थे भी तो उस समय तक कमजोर पड़ गयी थी. हमें यह लगा की पटना पुस्तक मेला एक केंद्र हो सकता है, भले ही साल भर में पन्द्रह दिन ही हो . शुरू में लेखकों, कवियों को घर-घर पास पहुंचवाने का काम हुआ फिर कई सम्मान और पुरस्कार की शुरुआत की गयी. सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुआ और धीरे-धीरे माहौल बदलना शुरू हुआ. 2003 में हमने फिल्म फेस्टिवल भी शुरू किया और कई कार्यक्रमों के साथ पुस्तक मेला का हर साल विस्तार होता रहा. आज पटना पुस्तक मेला साहित्य संस्कृति और पत्रकारिता का एक मजबूत केंद्र है.
सवाल – आपके जीवन में कौन सा ऐसा पल है जो आपको परेशान करता है ?
जवाब – यूं तो जीवन में कई ऐसे पल हैं जो परेशान करते हैं लेकिन एक वाकया मैं भूल नहीं पता. अक्सर मुझसे लोग पूछते थे कि आप क्या करते हैं ? मैं कहता था कि लिखता हूँ, तो लोग समझते थे कि मैं कवि हो गया हूँ, लेकिन वो फिर पूछते थे कि असली काम मैं क्या करता हूँ जीवकोपार्जन के लिए ? मैं निरुतर सा हो जाता था, क्यों कि मेरे पास कोई काम था नहीं. जब मेरी शादी कि बात हुई तो सवाल था की एक लेखक से भला कौन शादी करेगा ? लेकिन मेरा पटना में जो यह पुस्तैनी घर है और कुछ ज़मीन है, लोगों को लगा इससे रोजी रोटी चल जाएगी और इसी आधार पर मेरी शादी हुई. जब पत्नी से लोग पूछते थे कि आपके पति क्या करते हैं तो वो शरमा जाती थी कि क्या कहें ‘’मेरे पति लिखते हैं’’. एक दिन मेरी पत्नी मुझसे आकर भावुक होकर कहीं कि कोई जब पूछता है कि आपके पति क्या करते हैं ? जब मैं कहती हूँ की लेखक हैं, तो सामने वाले के भाव देख कर बहुत ख़राब लगता है. मैंने अपनी पत्नी से कहाँ की जिस बात के लिए आपको गौरव होना चाहिए आप शर्मिंदा हो रही हैं. मुझे ऐसा उम्मीद है कि ‘रेखना मेरी जान’ के बाद मेरे लेखक होने के प्रति लोगों में जो भाव है इसमें बदलाव आएगा और मेरी पत्नी को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. गौरव के साथ कह पाएंगी की मेरे पति लेखक हैं.
नचिकेता साहित्य पढ़ते हैं
सुधाकर कवि है.