युवा कविता #3 सना आसिफ


सना पटना में रहती हैं और अभी पटना विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए कर रही हैं. 
क्यों लिखती हैं ?
-मैं लिखती हूँ मगर क्यों ये कभी सोचा ही नही। लिखना अच्छा लगता है शायद इसलिए।


1.

पता है!
कल एक तितली आई थी मिलने
बाहर की दुनिया की ख़बर लाई थी 
आसमान का रंग अब भी नीला ही है
पेड़ अब भी झूमते गाते हैं 
झूले भी लगते हैं उनपर 
शाम में फ़िज़ा उतनी ही रंगीन होती है
तारे अब भी टिमटिमाते हैं 
लेकिन अब उन्हें देखकर 
सफ़र कोई नहीं करता 
कोई उनसे रास्ता नहीं पूछता 
तारे अब लोगों की मुट्ठी में होते हैं।
मेरा तारा खो गया था कहीं 
मेरा सफ़र अधूरा ही रहा
या यूँ कहें पिंजरे तक का सफ़र 
मुकम्मल हुआ।

2.

ये टोपी, ये चश्मे
सब नए ले लिए हैं 
तुमने,
पोशाक भी तो 
नए ही हैं ना
रंग रूप सब अलग
भेस ही बदल डाला
पहचान अलग बना ली।
मगर फिर भी तुम्हें
पहचान लेती हूँ 
तुम्हारे पुराने जूते से
जो धूल से सने हुए
ज़मीन पे ही होते हैं।

3.

क्या कहा?
मेरा कमरा देखना चाहते हो?
हाँ आओ, अंदर आओ।
नहीं नहीं, जूते मत उतारो
ऐसे ही आ जाओ।
यहाँ कुरसी पे बैठो।
माफ़ करना 
अस्त व्यस्त है सब
बिस्तर के आधे हिस्से में 
किताबें फैली हुईं हैं।
कपड़े बिखरे पड़े हैं।
समय ही नहीं समेटूँ सब।

अच्छा वह श्रृंगार मेज़!
हाँ कई वर्ष पुराना है।
आईना चनक गया था,
घर बदली के समय ही।
क्या? 
अपशगुन?
क्या कहा? बनवा दोगे?
जब मैं कहुँ? ठीक है।
किताब की अलमारी?
हाँ अवश्य देखो।
अच्छा! तुम्हें भी यह कवि पसंद है।
तुम बैठो।
मैं चाय लाती हुँ।
शक्कर कितनी लोगे?