युवा कविता #4 हिमांशु

"मैं क्यों लिखता हूँ?" - मैं प्रेम में लिखता हूँ। कभी अत्यधिक प्रेम मिलने पर लिखता हूँ, कभी बिल्कुल नहीं मिलने पर लिखता हूँ। कभी प्रेम मिलने की उम्मीद में लिखता हूँ, तो कभी प्रेम देने की चाह में लिखता हूँ।


 स्याह रातों की बात जिन रातों को मुझे कोई बेचैनी नहीं थी, जिन रातों को मुझे कोई उलझन नहीं थी, जिन रातों को मुझे कोई इंतेज़ार नहीं था, पर जब मैं देखता था दीवारों पर लगे मकड़ी के उन जालों को, जब मैं सुनता था पानी के बूंदों की निरंतर आती टप-टप की आवाज़ को, जब मैं सोचता था बाहर पसरे मुर्दा सन्नाटे के बारे में, ये उन स्याह रातों की बातें हैं। कहते हैं सपने सोने नहीं देते। सपना ही था कोई, या शायद तैयारी हो रही थी मन में कहीं, उस सपने को जीने की। या शायद युक्तियां सोची जा रही थी, उस सपने को उन स्याह रातों के कैद से निकालने की। पर एक जूनून और भी था आने वाले सूरज को रोक लेने का। सुबह के लाल सूरज से कोई दिक्कत थी शायद। या शायद आसमान में बिखरी सूरज की लालिमा पसंद नहीं थी। रोशनाई के गाढ़े-नीले रंग सा आसमान चाहिए था जब मुझे ये उन स्याह रातों की बातें हैं। उड़ान भरनी थी मुझे, उस पतंग के साथ जो मैंने खुद बनायी थी। पर मेरी बनायी पतंग भी मेरी तरह ही उड़ने से डरती थी। डरती थी कहीं हवा तेज़ हुई तो क्या करेगी। मैं भी डरता था। डरता था कहीं पंख ना खुले तो क्या करूँगा। धीरे-धीरे वो समझ गयी कि तेज़ हवा में वो खुल के उड़ पायेगी। एक दिन मैंने अपनी पतंग को आसमान में छोड़ दिया। मेरे रोशनाई वाले गाढ़े-नीले आसमान में। मेरी पतंग अब उड़ने लगी थी, सपने अब भी कैद थे। मैं अब भी डरता था। हिम्मत के धागे जोड़ने थे जब मुझे ये उन स्याह रातों की बातें हैं।


 
मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँ मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँ। तुम्हारी ये उम्मीद मुझसे फ़ालतू है कि मेरी कविता तुम्हारे लिए नाचेगी। ये मेरी कविता है। पर तुम इसे मेरा भोंपू समझो। मेरी ये कविता मेरे हिसाब से बोलेगी। मैं चाहूंगा तो गधे के ढेंचू में लय ढूंढेगी, या किसी बजबजाते नाले की तरह बदबू देगी। पर ये तुम्हारे आगे नहीं नाचेगी। खोखले उम्मीदों की लिपा-पोती भी मेरी मर्ज़ी से होगी। और ठरक की मात्रा भी मैं ही तय करूँगा। तुम्हारे बाल खुले रखने से मेरी कविता का कोई लेना देना नहीं है। तुम्हारे स्तनों के बीच फंसा लॉकेट, मेरी कविता नहीं निकालेगी। तुम चाहे जो कर लो, मेरी कविता तुम्हारी मेहंदी का रंग गाढ़ा नहीं करेगी। तुम चाहो तो नसें काट लो अपनी, या रो-रो कर गला फाड़ लो अपना। बता दो सबको मैं कितना गिरा हुआ था, ले लो सबकी झूठी सहानुभूति ख़्वाब पाल लो मुझे पछाड़ देने के। मेरी कविता तुम्हारे सारे भ्रम तोड़ देगी। मेरी कविता तुम्हारे आगे नहीं नाचेगी। क्योंकि मैं, तुम्हारा कवि नहीं हूँ।



तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया नकार दो मुझे। मत पढ़ो मुझे। क्यूँ पढ़ना मुझे, या मेरे लिखे किसी भी झूठ को। नापसंद हो जाऊं मैं, तुम्हारे चित्त से उतर जाऊं, यही चाहता हूँ मैं। मैं चाहता हूँ तुम छोड़ दो मुझसे अब कोई आस रखना। अब तक तुम्हारे जैसा हो कर, जो भी कमाया है मैंने, सब झूठ है। अब और झूठ कमाना मेरे बस का नहीं। तुम्हारी ये दुनिया, जो बस झूठ पर चलती है, इसका हिस्सा बनना अब, नहीं चाहता हूँ मैं। नहीं चाहता हूँ तुम्हारी दुनिया का झूठा प्यार। सच्चे मन से आया था मैं, पर तुमने, और तुम्हारे जैसे तमाशबीनों ने, झूठे प्यार का जो चोगा डाल दिया है मेरे ऊपर वो मेरे सच्चाई का ईनाम नहीं है। ये जो तुमने षड़यंत्र रचा है झूठी शोहरत का, इसके दांव-पेंच सीखना नहीं चाहता हूँ मैं। मैं धड़ाम से मुँह के बल गिर जाना चाहता हूँ। तुम्हारे झूठे आसमान में उड़ने से बेहतर है गिर जाना। क्योंकि गिर का संभला जा सकता है, पर अगर एक बार, तुम्हारे बनाये किसी झूठ की अट्टालिका से टकरा गया, तो टूट कर ढहे हुए उसी मलबे में शामिल हो जाऊंगा। उस मलबेे तले अपने सूरज बिना, मुरझाई हुई कोम्पल बनना, नहीं चाहता हूँ मैं। मैं डरा नहीं हूँ तुम्हारे इस झूठे मायाजाल से। बस इतना साहस मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। इतना साहस कि अकेला हो जाऊं, अपनी सच्चाई के साथ। मेरी वही सच्चाई जिसको तुम भ्रष्ट करने देना चाहते हो, अपने जैसा बना देने की होड़ में। तुम्हारे चंद ठहाकों के लिए, और सस्ता हो जाना, नहीं चाहता हूँ मैं। मंजूर है मुझे बंद हो जाना अकेलेपन की काल-कोठरी में। तुम्हारे झूठे इशारों से मन बहलाने से बेहतर है वो। पर उस अँधेरी कोठरी से, मेरा कालजयी सच बाहर निकले, शायद उसको भी तुम नकार दो, जिसे तुम अनसुना कर दो, पर मेरा वही सच मेरे साथ चले और मेरी पहचान बने, वही सच तुम्हारे कानों को बहरा कर देने तक गूँजें, यही चाहता हूँ मैं