युवा कविता #6 अभिषेक राज

अभिषेक मगध यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री ले रहे हैं. अभी प्रथम वर्ष में हैं. कहते हैं - ज्यादातर हिंदी में ही लिखता हूँ ।
मुहब्बत की गज़लें और कविताएँ लिखता हूँ। 1. 

छत के घेरे से टिककर वो प्रेमी देख रहा है चाँद को देख-देख कर खुश होता है, चाँद की चमक ; हवाओं की सरसराहट में सुनता है पाजेब की खनक ; मुस्कुराता है, हँसता है हवा में किसी का नाम लिखता है। चाँद कोने में खड़ा देखता है तमाशा उसका , जानता है, सब समझता है देख रहा है मुद्दतों से वो प्रेमियों का खुश होना, उसे पता है कुछ समय बाद आएगा ये इसी छत पर आँसू बहाने, चाँद फीकी हँसी हँसता है ।। 2.
 लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं मेरी मोहब्बत की दास्ताँ और वो बातें, जज्बातें अनसुलझी मुलाकातें; मैं अक्सर मौन हो जाता हूँ उनके सामने जब मैं शब्दों से शून्य नहीं माप पाता कह नहीं पाता कि समंदर की गहराई दिखाई नहीं देती हाँ कूद कर माप सको तो संभव है भवसागर पार होना । 3. 
तुझे भुलाने की कोशिशों में हद से गुजर भी जाऊँ फिर भी मुमकिन है तेरी तस्वीर आँखों से होकर दिल तक पहुँच जायेगी मैं धड़कनें रोक भी दूँ पर क्या करूँ तुम जो मुझ में साँस लेती हो मेरा कहा कब मानोगी । 4. 
किसी पेड़ के सूखे पत्तों की तरह मेरे ख्वाब गिर पड़ते हैं आँखों से बेजान होकर, चुपचाप निकल पड़ते हैं दर्द से परेशान होकर ; उनको भी पता है मुश्किल है जिन्दा रहना मुर्दों की तरह ।। 5. 
ये भी रोज़ का हिस्सा हो गया है, चाँद का निकलना मेरा उसे तकना , न किसी रोज़ चाँद को नींद आती है न मुझे ; अब धरती को ही कुछ करना होगा मुँह फेर लो इस चाँद से ।