युवा कविता #7 आदित्य प्रकाश वर्मा

आदित्य  दिल्ली में रहते हैं और एक कवि, दिल्ली महाविश्वविद्यालया से स्नातक  और एक शिक्षक हैं. कहते हैं -
मैं कविता लिखता हूं बताने को जो महसूस करता हूं, जो नहीं कह पाता ऐसे ही सीधे।

अकल दाढ़

अकल दाढ़ का निकलना
दर्दनाक परेशान करने वाला हो सकता है
कवि अपनी अकल  दाढ़ से जुझ रहा है
उससे ये पूछ रहा है
क्यों आ जाती हो बार बार ?

क्या कोई नाता है तुम्हारे नाम का तुम्हारे काम से ?

अगर तुम सिर्फ एक मामूली दाढ़ हो
तो मत आओं !!
तुम्हारे आने से पहले भी,
मै ठीक ही चबा रहा था |

शायद अकल दाढ़ को सवाल पसंद नहीं
शायद ये सवाल उसकी अकल पर अंकुश
लग रहे है उसे
और गुस्से में वो
हर लजीज  दावत के बाद
मेरा खून बहा, मुझे ही पिला देती है
मेरा सुजा हुआ गाल और
शरीर का बढा हुआ तापमान
उसकी नाराजगी की निशानी है

एक तरफ कवि है कि
उसके बिना खाना भी नहीं खाता

अकल दाढ़ का निकलना
कुछ सालों या
ज़िन्दगी भर का रासा (झंझट) हो सकता है

अगर तुम पिघलो

तुम बर्फ की एक चट्टान हो
तो मैं प्यार सा गर्म
थाम लूं तुमको मैं
अगर तुम पिघलो
तो फैल जाना मुझ पर
जैसे आकाश धरा पर
तुम वो सूरज मत बनना
वो सिर्फ दिन का साथी
अंधेरा कर चला जाता है
रात में
चांद सी यादें दिए

अगर तुम पिघलो
तो लेना रुप रुधिर
फैल जाना मुझ में
तुम वो सांस मत बनना
जो सिर्फ एक  पल साथ  
फिर खो जाती है

अगर तुम पिघलो
तो समय हो जाना , फैल जाना
मेरे भूत, भविष्य और वर्तमान पर
तुम वो अच्छे दिन मत बनना 

अगर तुम पिघलो
तो मौत बनना
बस आ जाना
ज़िन्दगी मत बनना
जो सिर्फ चार दिन की है.

Comments

मील के पत्थर

किसी तस्वीर में दो साल - उपांशु

बैसाख का महीना - निशान्त

सड़कें:एक केस स्टडी (कहानी)