युवा कविता #9 निशांत रंजन

 निशांत कहानियाँ लिखते हैं और कभी कभी कवितायेँ भी. कहते हैं -- कविता नहीं लिखता हूँ, उतना सामर्थ्य नहीं है मेरे अंदर. पर कभी कभार मन में जो भूचाल आता है, उसको इस माध्यम से व्यक्त कर देता हूँ. कविता लिखना तपस्या करने के समान है.

1.
इस कपोल कल्पित संसार में मैं खोया रहा अपने ही विचार में. इक़ कपोल कल्पित संसार में मैं क़ैद हो गया किराये के एक मकान में. इस कपोल कल्पित संसार में मैं बह गया अपने ही प्रवाह में. इक़ कपोल कल्पित सुनसान में मैं गुंगा बना रहा अपनी ही आवाज़ में. इस कपोल कल्पित संसार में मैं रोता रहा एकांत में. इस कपोल कल्पित संसार में सूरज डूब गया प्रभात में इस कपोल कल्पित संसार में दोपहर हो गया चाँदनी रात में इस कपोल कल्पित संसार में तारे जगमगा उठे सूरज के प्रकाश में. इस कपोल कल्पित संसार में विचार ढ़ह गये शोर की हठात में इस कपोल कल्पित संसार में मैं क़ैद बैठा रहा किराये के मकान में

2.

 
तुम्हारी विविध रूपों में से हर एक रूप को अलग कर हर एक रूप को निहारकर हर एक रूप को अपने में आधा बसाकर मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ जैसे की कोई मछली पानी से प्रेम करती है जैसे की युद्ध को जाता हुआ योद्धा अपनी तलवार से करता है जैसे की दुब मिट्टी से करता है जैसे की कोई माँ अपने बच्चों से करती है जैसे की कोई लेखक या कलाकार अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी से प्रेम करता है जैसे की प्रकृति जंगलों, पहाड़ो, कंदराओ और गुफाओं से करती है. प्रश्न अपने अतल प्रेम स्पर्श का है प्रश्न हमारे अस्तित्व का है प्रश्न तुम्हारी अक्षय करूणा का है तुम कुछ ऐसा करो की मैं दुब हो जाऊँ और तुम मिट्टी तुम प्रकृति हो जाओ और मैं तुम्हारा सौंदर्य तुम ऐसी औषधी हो जाओ जिसे निगल लेने से मेरे भीतर का असत्य कुलबुलाकर तुम्हारे सामने आ जाये प्रश्न अस्तित्व का है साथी, प्रश्न जीवन का है तुम कुछ ऐसा करो की मैं तुमसे निरंतर प्रेम करता रहूँ.