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मन भर लिख सकूँ और अपनी शैली में स्वीकार की जाऊं - अपर्णा अनेकवर्णा


अपर्णा अनेकवर्णा हमारे समय की ज़रूरी कवि हैं. हिंदी के अलावे अंग्रेजी में भी लिखती हैं. इनकी अपनी शैली और अपना कहन है . काफी डाइवर्स पढ़ती हैं और खूब लिखती हैं.


 १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? 

 कविता को मैं पद्य में बाँध कर नहीं देख पाती. मुझे कविता की सम्भावना और उसकी उपस्थिति हर जगह दिखती है. वो संवेदना हो, नौ रसों में सिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया हो या उनकी अनुपस्थिति हो, प्रकृति के हर स्वरुप में, गद्य में हो, कविता हर जगह है. अपनी 'रॉ' और 'प्राइमल फॉर्म' में. जो हम शब्दों में अभिव्यक्त कर पाते हैं वो 'टिप ऑफ़ द आइसबर्ग' ही है. मैंने कविता जीवन के चौथे दशक में प्रवेश करने के बाद लिखनी शुरू की. तो मैं ये कह सकती हूँ कविता ने मुझे चुना. एक परिपक्वता को पाने के बाद ही मैं स्वयं में इससे साक्षात्कार कर सकी. उसके पहले मैं एक पूर्ण रूप से समर्पित और सम्मोहित पाठक ही थी और उपन्यास ही मेरी सर्वप्रिय विधा थी. हिंदी साहित्य से भी यथासंभव समग्र रूप में जुड़ना इन चार सालों में ही हुआ. मैं ये भी नहीं जानती कि ये कृपादृष्टि कब तक रहेगी पर ये बात निश्चित है की इन चार सालों में एक काव्य-बोध उत्पन्न और विकसित हुआ है और आगे भी हो रहा है. २.पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?

 किसी भी कवि की आरंभिक रचनाओं में एक कच्चापन होता है जो कि एक अजीब सा आकर्षण और ताज़गी लिए होता है. उसकी मौलिकता अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही होती है. इसमें बेपरवाह उड़ान का उद्घोष और कहीं नयेपन का संकोच भी होता है. पर इस फेज़ के बाद कविता में एक ठहराव नहीं आये तो यही गुण चुभने लगते हैं. पठन से लेखन को एक दिशा मिलती है. बल्कि मेरा अनुभव रहा है कि रचनाकार जितने ही भाषाओं और संस्कृतियों से जुड़ता है उसका संसार को देखने का नजरिया उतना ही विस्तृत होता जाता है. और एक कवि का संकुचित रह जाना अक्षम्य अपराध है. पठन प्रचलित और अनोखे बिम्बों और शैलियों से परिचित करता है. कभी आपको ये आश्वस्ति होती है कि मुझ सी सोच वाले और भी हैं. ३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?

 मेरी शिक्षा उत्तर प्रदेश माध्यमिक बोर्ड (हिंदी माध्यम) से हुयी. साहित्यिक हिंदी ही पढ़ाई गयी और छायावाद तक के कवियों से परिचय हुआ. पता नहीं क्यों हमें आधुनिक कविता बिलकुल ही नहीं पढ़ाई गयी. महादेवी वर्मा और कबीर शुरू से अच्छे लगे. 'मैं नीर भरी दुःख की बदरी' ने तब मात्र उस दृष्टि के कारण बहुत प्रभावित किया. सुभद्रा कुमारी चौहान की 'बुंदेले हरबोलों के मुंह' भी अपनी अभूतपूर्व ऊर्जा के कारण पसंद थी. उसका सस्वर पाठ किया जाता. पर कबीर पर लौट लौट आती. सुबह रेडियो पर भजन में भी कबीरवाणी अलग तरह से प्रभावित करती थी. फिर उपन्यास आये जीवन में और कविता कहीं पीछे छूट गयी. 'धर्मयुग' में डॉ धर्मवीर भारती की लिखी एक लम्बी कविता ने भी बहुत प्रभावित किया था. वो गंगा दशहरा पर लिखी थी उन्होंने.. जल प्रवाह में बहते कनेर के गुच्छे का बिम्ब आज भी याद है. किसी भी कवि की सभी कवितायेँ अच्छी नहीं हो सकतीं. पर कुछ रचनाकार हैं जिनकी शैली प्रभावित करती है.. जिनमें कुंवर नारायण अरुण कमल, दिलीप चित्रे, तेजी ग्रोवर, पारुल पुखराज, अनुराधा सिंह, दर्पण शाह, आशुतोष दुबे, अम्बर पांडेय की शैली प्रभावित करती है. जितना पढ़ रही हूँ उतना ही सीख रही हूँ. अनेक और नाम हैं. ४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?

 कविता की प्रासंगिकता हमेशा ही रहेगी. शायद हम उसे समझ भी नहीं पाते पर वो मनुष्य होने की एक आवश्यक शर्त है. हमारे भीतर जो भी आवेग संवेग है, वो किसी गीत, ग़ज़ल, शायरी, कविता, भजन, लोक गीत, यहाँ तक कि नए युग के नए प्रतिमानों पर कसे हुए नए बोल, धुन के गीत.. जो किसी एक भाषा के मोहताज नहीं, में अभिव्यक्ति पाते हैं, हम उनसे रिलेट करते हैं. बदलाव कितने भी आ जाएँ कविता किसी न किसी रूप में हमेशा रहेगी. ५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?

 कुछ तो 'वर्ड ऑफ़ माउथ' से, और बाकी अपने इंस्टिंक्ट और कुछ पूर्व अनुभव से चुनती हूँ. अब बहुत कुछ नेट पर उपलब्ध है तो वहां से पढ़कर एक अनुमान लग ही जाता है. हाँ, यहाँ भी आश्चर्यजनक और अनअपेक्षित रूप से गलत भी साबित होती हूँ. वो भी रोचक होता है. ६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

 छंदमुक्त ही लिखती रही हूँ तो और भी ज़रूरी हो जाता है कि इस आज़ादी में अराजक न हो जाऊं. तो शिल्प का एक मोटा-मोटा खांचा तो आपके ज़हन में होना ही चाहिए. मसलन कविता है तो प्रथम शर्त तो यही है कि लय होनी ही चाहिए. मुझे संस्कृतनिष्ट-हिंदी और उर्दू का घालमेल नहीं पसंद. अंग्रेजी के कुछ शब्द कभी कभी और अधिकतर हिन्दुस्तानी ही प्रयोग करती हूँ. अनावश्यक विस्तार भी ध्यान भटकाता है, एकरसता उत्पन्न करता है. बाकी इतना ध्यान तो रखती ही हूँ कि जो कहना है वो कम से कम शब्दों में भरपूर कह सकूं. ७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 अपनी बात कहूँ तो जो इच्छा धीरे धीरे पनपी वो यही थी कि मैं अपने मन भर लिख सकूं और मुझे मेरी शैली में ही स्वीकार किया जाए. पाठक कम हों पर वो मेरी कविता को जस का तस समझ आनंद लें. संभव हो तो अपना पाठ भी जोड़ें. आप इसे प्रसिद्धि ही समझ लें और मैं इसे अमरता से भी जोड़ कर देखती हूँ. यहाँ ये स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अन्य किसी भी क्षेत्र की तरह साहित्य में भी सभी हथकंडों का प्रचलन है और इसका आपके एक प्रतिभाशाली रचनाकार होने न होने से कोई सम्बन्ध नहीं. बहुत भ्रम भी टूटे और अच्छा हुआ कि टूटे. उसने मुझे भयमुक्त और आज़ाद किया है.

 ८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 अभी तो खुद को ही नया ही मानती हूँ. पर अपने वयस के अनुभवों की और लम्बे समय से एक पाठक बने रहने के बाद लेखन में आने की भी एक विशेष 'वरीष्ठता' है. तो हर नए और कमउम्र लिखने वालों को कहूँगी कि खूब पढ़ें और लोक से लेकर विश्व साहित्य सब पढ़ें, सिनेमा, थिएटर, कला, संगीत से भी यथासंभव जुड़ें, एक विस्तृत और उदार दृष्टिकोण विकसित करें और सबसे महत्वपूर्ण कुछ भी नया प्रयोग करने से न झिझकें. ये आपमें एक परिपक्वता, एक दर्शन, एक मौलिकता, एक साहस भरेगा जो आपके लेखन में हर बार परिलक्षित होगा. ९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?

 मैंने गेब्रियल गार्सीअ मार्क्वेज़ की 'वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड' अंग्रेजी में जो कि स्पेनिश का अनुवाद थी, को कॉलेज में पढ़ा था और बेहद मुतास्सिर हुयी थी. बल्कि जादुई यथार्थवाद मेरा प्रिय जॉनर बन गया था. आजकल मैं उसका हिंदी अनुवाद पढ़ रही हूँ जो आउट ऑफ़ प्रिंट होने की वजह से फोटोकॉपी ही उपलब्ध हो सका है. तो इस 'ट्वाइस रिमूव्ड वर्शन' का भी एक अलग आनंद है. दिलीप चित्रे की अंग्रेजी और मराठी कविताओं का हिंदी अनुवाद पढ़ रही हूँ. पढ़ने के लिए जो ऊर्जा और समय चाहिए वो कमउम्र में भरपूर होती है. मैं पठन को किसी सीमा में नहीं बांधना चाहती. बल्कि आप सब कुछ पढ़ें जो और जितना पढ़ सकें. नयी भाषाएँ सीखें. मूल नहीं आता तो अनुवाद पढ़ें. हर जॉनर को पढ़ें और समृद्ध हों.

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It was never about writing poems at first. My journey started with enjoying poems especially Urdu, then Hindi, English and a very little bit of Sanskrit & Persian.
I will read a poet, then get details of the poet, then I will get some keywords while reading about, for example if you read Nirala, you will know Chayavaad. If you read Daag Dehlvi, it will introduce you to two eras of Urdu poetry and since when Ghazals rules and structure started to be lenient and then we meet the Dushyant from Hindi ghazals.
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