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Showing posts from October, 2017

युवा कविता #14 एकांश गुप्ता

मैं एकांश गुप्ता, कहने को तो इंजीनियरिंग कर रहा हूं NIT JAMSHEDPUR से, लेकिन अक्सर हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए पाया जाता हूं।

मैं क्यों लिखता हूं? इस प्रश्न का कोई मनभावन जवाब ना तो मुझे अब तक मिल पाया है ना उम्मीद है कभी मिल पाएगा । बस अक्सर ऐसा लगता है कोई टीस है मन में जो अक्सर मजबूर करती है अपनी बात कहने को क्योंकि शायद जिस माहौल में हूं, वहां अक्सर अपने मन की बातें कह नहीं पाता। शायद इसलिए ही लिख देता हूं।

सिगरेट

मेरे साथ खड़े दोस्त अक्सर, जब सिगरेट जला लेते हैं। मैं भी अक्सर तुम्हारी, यादों के छल्ले उडाने लगता हूं। इस उम्मीद में किसी रोज, तुम मेरे अंदर से खत्म हो जाओगी। जैसे वह सिगरेट हो जाती है, उंगलियों के बीच में फस कर। मगर यह भूल जाता हूं, उडाने के लिए छल्ले हवा में, कश को अंदर लेना पड़ता है। शायद इसलिए तुम से, जितना दूर जाना चाहा है। अक्सर उतना दिल तुम्हारी, यादों को मन में भर लेता है।। मानो तुम कोई सिगरेट हो, जिंदगी की, जिसे हर शाम, में यादों के लाइटर से, जला लेता हूं।।


जख्म

कुछ चोटे होती है ना, जो बरहा कुछ नहीं होती। बस छलक उठता है लहू या आंसू। यूं ही कहीं टकराने से, ल…

युवा कविता #13 आफिज़ा तरन्नुम

आफिज़ा कहती हैं :- 
लिखना सुकून देता है ठीक वैसे ही जैसे की कुछ अच्छा पढ़ना...जब आप चीज़ों को महसूस करते हैं तो दिल करता है उस एहसास, उस पल, उस भावना और उस प्रेम को सहेज कर रख लें हमेशा के लिए... और इसके लिए लिखने से अच्छा और क्या हो सकता है..क्यूँकि कहा हुआ भुलाया जा सकता है पर लिखा हुआ मिटाया नहीं जा सकता



लिखो, 

कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है लिखो,
कि बहुतों का पढ़ा जाना बाकी है ये न सोचो कि
लिखने से क्या हासिल होगा ये सोचो

युवा कविता #12 विशेष चन्द्र नमन

विशेष फ़िलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं और वहाँ साहित्य के लिए कई तरह के काम करते हैं. उनका परिचय और उनके लेखन के बारे में उनके शब्दों में - 

मैं क्यों लिखता हूँ ? इस सवाल का कोई ख़ास व सटीक उत्तर मेरे पास नहीं है, हो भी नहीं सकता. सोचता हूँ, और बचपन से लेकर अबतक के जीवन से समझने की चेष्टा करता हूँ तो यह जान पड़ता है की मेरे लिखने का सबसे पहला कारण यह रहा होगा कि मैं लोगों के बीच आसानी से खुल नहीं पाता, बोल नहीं पाता और इसी का After effect कह लें जो मेरे लिखने की शुरुआत करता है. पढने का खूब शौक रहा है. बचपन से ही साहित्य, कला- विज्ञान में खूब रूचि थी जो बढ़ती ही गयी.पहली कविता छठी कक्षा में धोनी पर लिखी थी. मैं झारखण्ड के एक छोटे से कस्बे धनवार का था और 10वीं तक वहीँ रहा. दसवीं बाद धनबाद में दो साल पढाई हुई, और वहीं मेरी कविता का असली खेत बना. पिछले दो वर्ष से दिल्ली विवि में गणित पढ़ रहा हूँ. दिल्ली को देखता हूँ. दिल्ली आकर बहुत ज्यादा पढना-सीखना-मिलना-जुलना-घुलना-लिखना हो पाया.ढेर सारे अंतर्द्वंद हैं , दुःख- सुख को समझने की कभी- कभार की चेष्टा है , कुछ संदेह - कुछ आवाज़ जिन्हें छ…

युवा कविता #11 सागर

सागर इतिहास से स्नातक की पढाई कर रहे हैं. कहते हैं - हालात को देखते हुए लिखने का प्रयास करता हूँ । चाहे वो प्रेम हो या समाज । संक्षिप्त में कहूँ तो मेरा आशय विरोध रहा है , बदलाव रहा है । समाज से लेकर प्रेम तक । अपने गाँव और प्रेम के लिए ज्यादा लिखना चाहता हूँ ।


एक. 

तुम एक चैनस्मोकर हो और , मैं हूँ , तेरे लिये " एक सिगरेट " । उसका आखिरी हिस्सा "फिल्टर" मेरा प्रेम है । एक तरफ तुम लगाती हो लाइटर , सुलगा देती हो मुझमें "हल्की-सी-चिंगारी" । हवा में छोड़ती रहती हो फुँकें , उड़ाती हो मुझे , धुँआ बनाकर आसमानों में , और हरेक धुएँ के साथ , खत्म होता जाता हूँ मैं । कुछ ही क्षणों बाद जब मुझमें लगी , हल्की चिंगारी पहुँच जाती है , फिल्टर के पास और तेरे होठों के नीचें । फ़िर ,तुम फेंक देती हो मेरे बचे हिस्से को , और अपने प्यारे पैरों से मसल कर अंत कर देती हो , मेरा और मेरे "प्रेम के फिल्टर" का जिसे होठों से दबाए चूमती रहती हो तुम , एक "चैनस्मोकर" बनकर । 


दो. खत्म हो इंतज़ार , आ जाये प्रलय ----------------------- कभी ऐसा हो कि आसमान को नींद …

ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता - अस्मुरारी नंदन मिश्र

अस्मुरारी पटना के हम पाठकों के लिए नए हैं. उनको कुछ दिन पहले ही जल्दी जल्दी दो तीन बार सुनने का मौका मिला. उनकी कवितायेँ ईर्ष्या भी पैदा करती हैं और प्रभावित भी करती हैं, कवि अपनी ज़मीन पर इतने मज़बूत और इतने मंझे हुए कि प्रतिरोध अपने इंडिविजुअल शिल्प के साथ कविताओं में मैनिफेस्ट होता है.
हम उनकी कुछ कविताओं को भी इस साक्षात्कार के साथ लगा रहे हैं. उनका एक संग्रह "चांदमारी समय में" बोधि प्रकाशन से प्रकाशित से.
- अंचित


  १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की?

‘कविता क्या है?’ अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है| और उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा हो भी नहीं सकती| लेकिन मेरे लिए वह जगत के उद्दीपन के प्रति शाब्दिक अनुक्रिया है| जरूरी नहीं कि यह अनुक्रिया उद्दीपन के साथ लगी ही आए| लेकिन है वह यही| मुझे हमेशा लगता रहा है कि सृजनशीलता मनुष्य की सामान्य विशेषता है| वैसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सृजनशील न रहा हो| लेकिन अभिव्यक्ति के रूप में अंतर आ जाता है| कोई किसी कलारूप को अपनाता है, तो कोई किसी विधा का हो जाता है| कलारूपों और विधाओं के चुनाव में कहीं-न-कहीं हमारे बचपन की परिस…