युवा कविता #11 सागर


 सागर इतिहास से स्नातक की पढाई कर रहे हैं. कहते हैं - हालात को देखते हुए लिखने का प्रयास करता हूँ । चाहे वो प्रेम हो या समाज । संक्षिप्त में कहूँ तो मेरा आशय विरोध रहा है , बदलाव रहा है । समाज से लेकर प्रेम तक । अपने गाँव और प्रेम के लिए ज्यादा लिखना चाहता हूँ ।


एक. 
 
तुम एक चैनस्मोकर हो और , मैं हूँ , तेरे लिये " एक सिगरेट " । उसका आखिरी हिस्सा "फिल्टर" मेरा प्रेम है । एक तरफ तुम लगाती हो लाइटर , सुलगा देती हो मुझमें "हल्की-सी-चिंगारी" । हवा में छोड़ती रहती हो फुँकें , उड़ाती हो मुझे , धुँआ बनाकर आसमानों में , और हरेक धुएँ के साथ , खत्म होता जाता हूँ मैं । कुछ ही क्षणों बाद जब मुझमें लगी , हल्की चिंगारी पहुँच जाती है , फिल्टर के पास और तेरे होठों के नीचें । फ़िर ,तुम फेंक देती हो मेरे बचे हिस्से को , और अपने प्यारे पैरों से मसल कर अंत कर देती हो , मेरा और मेरे "प्रेम के फिल्टर" का जिसे होठों से दबाए चूमती रहती हो तुम , एक "चैनस्मोकर" बनकर । 


 दो. खत्म हो इंतज़ार , आ जाये प्रलय ----------------------- कभी ऐसा हो कि आसमान को नींद आ जाये , एक-एक को लेकर धरती बेहोश हो जाये और पूरा मोहल्ला सुनसान हो जाये । हरेक कोने से , शांत सी डरावनी आवाज़ , सुर मिलाकर गाती रहे । वहाँ मैं अकेला , भटकता रहूँ , हर तरफ़ जैसे किसी को ढूंढने को ही जिन्दा बचा हूँ । टकराता रहूँ , दीवालों , मकानों और हरचीज़ से किसी से टकराने की आस में और हर एक चोट भुलाता रहूँ । फिर टकरा जाऊं उससे , जिसके लिये , "ये प्रलय" मिलन का एक मौसम बन आया हो , वो तुम रहो जो जाग रही हो , भटक रही हो ,किसी की आस में बिल्कुल मेरी तरह । मिलते ही , जल जाये वो चाँद भी ओढ़ ले वो बादलों का चादर , छा जाये , अँधेरा जिसमें , बस मैं दिखूँ और तुम दिखो । हर ओर , डरावनी आवाज़ की जगह , मेरा इंतज़ार , मेरा प्रेम गुनगुनाने लगे , जिसे सिर्फ तुम सुन सको । हम भूल जाएं सबकुछ , और प्रलय होता रहे हमारे चारों ओर , धरती के साथ हर एक जीव बेहोश रहे , सूरज फिर उगे नहीं और चाँद छुपा ही रहे , बस मैं रहूँ , तुम रहो और सर्वस्व रहे हमारा । 

नींद के नशे से ज्यादे ख़तरनाक हो "तुम" ----------------------------- अंगड़ाई लेती रातें , सोई हुई , भागी हुई नींदों को , आज दिनों बाद जगा रही है । नींद ,उस नशे की तरह बन आई है जिसे आज , मैंने पहली दफ़ा किया हो, मग़र अंधाधुंध लिया  हो और अब वो बड़ी तेज़ी से , मुझपर , चढ़ कर अपना करतब दिखा , मुझे बेहोश कर देना चाहती हो । ये नशा इतना हावी हुआ है ,मुझपर कि ये मुझे उठकर बैठने और पलकों को उठाकर , हिम्मत से डँटकर रहने की , इजाज़त भी नहीं दे रहा । मेरा हाथ किसी भी तरह बत्ती बुताने के प्रयास में जुटा है , घड़ी की हल्की-धीमी आवाज़ कानों में जोड़दार और डरावनी आवाज़ बनकर घुसती चली जा रही है । स्ट्रीट लाइट्स की रौशनी भी , बहुत कम और धूँधली-धूँधली दिख रही है । मेरी आँखें लाल टूस बनकर , काट रही है बूँदों को छलका रही है ,और मेरा मुँह काला , स्याह-सा बन गया है । मग़र मैं हूँ कि सोना नहीं चाह रहा, किसी वजह से , इससे और देर तक लड़ना चाह रहा हूँ । वो वजह इन रातों में , बस तुम ही बन सकती हो और तुम ही हो , क्यूँकि तेरी आवाज़ की हल्की भनक , मेरे कानों तक अब तक पहुँच रही है , तेरा मन भी अबतक खुलकर मुझे ही एकटक देख रहा है , और मेरी , तुम्हेँ देखने की आशाओं को सोने नहीं दे रहा । मैं इस नशें से , नींद से , मौत से आज तबतक लड़ूँगा , जबतक कि तुम्हारी आवाज़ , मेरी कानों को और खुला दरवाजा , मेरी आँखों को छोड़कर , अचानक से बंद न हो जाये । नींद और तुम वजह बनकर मुझे मार जाओगी , मैं एक लाश की तरह गिर पड़ूँगा और आज सपनों पर प्रतिबंध लगाकर , सो जाऊँगा ।