युवा कविता #12 विशेष चन्द्र नमन

विशेष फ़िलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं और वहाँ साहित्य के लिए कई तरह के काम करते हैं. उनका परिचय और उनके लेखन के बारे में उनके शब्दों में - 

मैं क्यों लिखता हूँ ? इस सवाल का कोई ख़ास व सटीक उत्तर मेरे पास नहीं है, हो भी नहीं सकता. सोचता हूँ, और बचपन से लेकर अबतक के जीवन से समझने की चेष्टा करता हूँ तो यह जान पड़ता है की मेरे लिखने का सबसे पहला कारण यह रहा होगा कि मैं लोगों के बीच आसानी से खुल नहीं पाता, बोल नहीं पाता और इसी का After effect कह लें जो मेरे लिखने की शुरुआत करता है. पढने का खूब शौक रहा है. बचपन से ही साहित्य, कला- विज्ञान में खूब रूचि थी जो बढ़ती ही गयी.पहली कविता छठी कक्षा में धोनी पर लिखी थी. मैं झारखण्ड के एक छोटे से कस्बे धनवार का था और 10वीं तक वहीँ रहा. दसवीं बाद धनबाद में दो साल पढाई हुई, और वहीं मेरी कविता का असली खेत बना. पिछले दो वर्ष से दिल्ली विवि में गणित पढ़ रहा हूँ. दिल्ली को देखता हूँ. दिल्ली आकर बहुत ज्यादा पढना-सीखना-मिलना-जुलना-घुलना-लिखना हो पाया.ढेर सारे अंतर्द्वंद हैं , दुःख- सुख को समझने की कभी- कभार की चेष्टा है , कुछ संदेह - कुछ आवाज़ जिन्हें छूना चाहता हूँ , और बस लिखता हूँ.


 सपने -------- एक पेड़ हुआ, पत्ते सूखे, बिखर गए एक नदी बही जिस्मों के अवशेष धुले मंदिर का एक द्वार खुला कुछ फूल चढ़े, कुछ दूध बहे एक सादा कागज़ ज़र्द हुआ कुछ शब्द सुनहरे बदल गए एक पतला लड़का तार हुआ सपने जीवन से बड़े हुए फिर धरती घूमी, दिन बीता तार टूटकर कहीं गिरा अगले जीवन की आशा में कुछ सपने फिर से धरे रहे ।। 


 किसी दिन ---------------- जिन कविताओं को सोंचकर छोड़ दिया कभी किसी काँपती पुतलियों पर कभी किसी सफर की थकान में कभी किसी अधपकी रोटी में उन्हें फिर जब देखूँगा, लौटूँगा, पाऊंगा एक कोना, अपने स्मृति की कक्षा में. मैं, फिर सोच रहा हूँ: रात है चाँद मेघ में क़ैद है, मैं तेरी स्मृतियों के गृह में जिसकी दीवार पर किसी बेचैन दीये की लौ से खींची कालिख की काजल लगा मैं अपने चक्षुओं में जल भरता हूँ रात के तीसरे पहर जब दायीं करवट लेता हूँ, 
मेरा दायाँ कंधा तेरे भार से सुन्न पड़ जाता है एक प्रतीक्षा रहती है मुझमें,
असहनीय है, रुके हुए रक्त की छटपटाहट है तुम, दीवार के उस तरफ की दीवार पर हरा लिखती हो इस तरफ पीला उग आता है झर जाऊंगा किसी पल मैं भी पीला होकर उन्ही काँपती पुतलियों पर, उन्ही सफर की थकान में, उन्हीं अधपकी रोटियों पर उन्हीं कविताओं को सोंचकर.



 प्रेम- बगीचा ------------------ रात के स्वप्न में जितने नीर बहे, वे सभी फैल जाएंगे हमारे प्रेम बगीचे में ओस की तरह. तुम जब, पूजा के फूल लेने प्रवेश करोगी बगीचे में, तेरे तलवों को ये नमकीन ओस चूमेंगे, चुभेंगे, और भर देंगे एक सिहरन तेरे रोम- रोम में. अभी सूरज नहीं निकला है, मैं अभी भी स्वप्न में हूँ, वेदनाएं अब भी निकल रही हैं, निर्झर. कुछ अंतिम ओस अब भी गिरने हैं आकाश से, जो इंतज़ार में हैं गुलाब के कलियों के खिलने की, जो ले आते हैं तेरे होठों पर तबस्सुम, सुबह हो गयी है, कुछ ओस, जो तेरे स्पर्श से दूर रहे, उन्हें समेट ले जाएगा सूरज फिर से वापस बिखेरने के लिए, सूरज, मेरा मित्र कल फिर खिलाना चाहता है ग़ुलाबों को हमारे प्रेम बगीचे में.