युवा कविता #13 आफिज़ा तरन्नुम

आफिज़ा कहती हैं :- 
लिखना सुकून देता है ठीक वैसे ही जैसे की कुछ अच्छा पढ़ना...जब आप चीज़ों को महसूस करते हैं तो दिल करता है उस एहसास, उस पल, उस भावना और उस प्रेम को सहेज कर रख लें हमेशा के लिए... और इसके लिए लिखने से अच्छा और क्या हो सकता है..क्यूँकि कहा हुआ भुलाया जा सकता है पर लिखा हुआ मिटाया नहीं जा सकता



लिखो, 

कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है लिखो,
कि बहुतों का पढ़ा जाना बाकी है ये न सोचो कि 
लिखने से क्या हासिल होगा ये सोचो कि जो न लिखा तो फिर बहुतों का क्या होगा? तुम्हारे लफ्ज़ देते हैं आवाज़ उन छुपे हुए हौसलों को, दबी हुई चीख को.. लिखो, कि जो न लिखा तो खुद से कैसे नज़रें मिला पाओगे ?

 कलम जो उठे तो किसी का तुम पर यकीन बने

 किसी मासूम के खून के धब्बों को छिपाने के लिए मत लिखो किसी की चीख दबाने के लिए मत लिखो लिखो, जो न लिखा तो बहुत देर हो जाएगी अभी तो है उजियाला समझ का...जो न लिखा तो अंधेर हो जाएगी जो न लिखा तो कैसे भेड़ चाल से अलग कहलाओगे ? जो न लिखा तो मुमकिन है कि जीते जी अपनी अंतरात्मा को मार खाओगे 

लिखो की अभी बहुत ट्रोलिंग भी बाकी है बहुत स्क्रोलिंग भी बाकी है

 क्या हुआ जो है मालूम कि गर लिखा तो क़त्ल कर दिए जाओगे लिखो कि लिखने वालो के दिलो से ये खौफ मिटाना जरूरी है लिखो कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है...

 PS: हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के लिए! 
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हूँ कौन मैं...

 
खुली हुई किताब हूँ,
या धुंधली सर्द रात हूँ...

लहजे से कोई ना पकड़ सका
इज़्तेराब मेरे हालात का,
मुसलसल गिरती हुई
मैं कोई आबशार हूँ...
 

मुख्तलिफ ख़यालात हैं
ज़माने की भीड़ से,
कौन मासूम, कौन अय्यार
हूँ इसी आज कशमकश में मैं...
समझ सकूँ मैं ये जो फन
मैं उस मौत्ज्ज़े की तलाश हूँ...

हूँ कौन मैं...

मुख़्तसर ये ज़िन्दगी
है मुझको लम्बी लगने लगी,
दिन गुज़रते जा रहे
मंजिल मगर मिलती नहीं,
लड़खड़ाने लगे हैं अब क़दम
मैं कोई खौफ्ज़ेदाह सी राह हूँ...

मुतास्सिर हूँ हर्फों से मैं
है मिलता सुकून वस्ल-ए-कलम से,
दो लफ्ज़ कागज़ पर उतार
मैं सहर के इंतज़ार हूँ..

खुद में हूँ गुमशुदा
या भीड़ में,
वाकिफ़ हूँ हक़ीक़त से फिर भी
मुन्तज़िर कोई ख़्वाब हूँ...

हूँ कौन मैं...

PS: बड़ी Aristocracy है ज़बान में
फ़कीरी में भी नवाबी का मज़ा देती है उर्दू