युवा कविता #14 एकांश गुप्ता

मैं एकांश गुप्ता, कहने को तो इंजीनियरिंग कर रहा हूं NIT JAMSHEDPUR से, लेकिन अक्सर हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए पाया जाता हूं।

 मैं क्यों लिखता हूं? इस प्रश्न का कोई मनभावन जवाब ना तो मुझे अब तक मिल पाया है ना उम्मीद है कभी मिल पाएगा । बस अक्सर ऐसा लगता है कोई टीस है मन में जो अक्सर मजबूर करती है अपनी बात कहने को क्योंकि शायद जिस माहौल में हूं, वहां अक्सर अपने मन की बातें कह नहीं पाता। शायद इसलिए ही लिख देता हूं।

सिगरेट

मेरे साथ खड़े दोस्त अक्सर, जब सिगरेट जला लेते हैं। मैं भी अक्सर तुम्हारी, यादों के छल्ले उडाने लगता हूं। इस उम्मीद में किसी रोज, तुम मेरे अंदर से खत्म हो जाओगी। जैसे वह सिगरेट हो जाती है, उंगलियों के बीच में फस कर। मगर यह भूल जाता हूं, उडाने के लिए छल्ले हवा में, कश को अंदर लेना पड़ता है। शायद इसलिए तुम से, जितना दूर जाना चाहा है। अक्सर उतना दिल तुम्हारी, यादों को मन में भर लेता है।। मानो तुम कोई सिगरेट हो, जिंदगी की, जिसे हर शाम, में यादों के लाइटर से, जला लेता हूं।। 


जख्म


कुछ चोटे होती है ना, जो बरहा कुछ नहीं होती। बस छलक उठता है लहू या आंसू। यूं ही कहीं टकराने से, लेकिन हम लोग अपनी आदत से मजबूर। उन्हें, कुरेद कुरेद कर। अक्सर एक करहाता घाव बना देते हैं।। और तड़पते रहते हैं दर्द में, जब तक कोई किसी नश्तर के सहारे से, उसका मुकम्मल इलाज नहीं कर देता।। भर जाता है वह घाव, वक्त की धूप के साए में और, रह जाता है बस एक निशान, अनंत काल तक।। यह बताने को कि, हर चोट को जख्म नहीं बनाया जाता।। अच्छा सुनो, कुछ रिश्ते भी तो ऐसे ही होते हैं ना ?


इश्क हुआ था

 एक शाम में, जब सावन बरस कर जा चुका था। वह तीज का त्योहार भी, अपने नए रंगों से या कुछ मनोभाव से, प्रकृति को सवार कर जा चुका था।। उस रोज तुम थोड़ी देर से आई थी, गुस्सा नहीं था मैं। पर न जाने क्यों तुमने अपना, सुर्ख लाल मेहंदी लगा हाथ आगे कर दिया था ? जिसमें एक दुनिया बसी थी, एकटक देखता रहा था मैं, फिर पता चला कि उस दुनिया के किसी कोने में, मेरे नाम का पहला अक्षर छुपा हुआ था।। उस मेहंदी से, तुमसे, उस पल, उस शाम में फिर से इश्क हुआ था।। फिर एक रोज जब जनवरी की सर्दी जाने को थी तब तुम्हारे नाम से एक कोरियर मिला था उसे देख कर पसीने से भीग गया था जैसे न जाने कौन सी भला आने को थी इतने अरसे बाद यह अचानक क्या और क्यों.? उसमें कार्ड रखा था, "मुझे पता है तुम यह नहीं रखोगे, लेकिन हैंड मेड हार्ड तुम्हें पसंद है इसलिए।" यह एक छोटे से कोने में लिखा हुआ था। उस कार्ड से, तुमसे उस पल, उस शाम में फिरसे इश्क हुआ था।।

फिर कल रात, जब मैं ऐसे ही हर बात लिखना चाहता था। तुम्हारी याद नहीं थी फिजा में कहीं भी, लेकिन दूर कही तूफान में, कुछ लम्हे गिर रहे थे। मैं हर उस ख्याल को खुद से बहुत दूर जमा देना चाहता था। लेकिन रह-रहकर पिघलता रहा था कुछ, मेरे भीतर। शायद वह नफरत थी, जो मैं एक अरसे से तुम से निभा नहीं पाया हूं। या वह मोहब्बत थी, तुमने निभाने का वादा कभी किया ही नहीं था। रात बीत रही थी मेरी आंखों के सामने से, संग उसके बीत रहे थे लम्हे जैसे कल ही सब हुआ था। उन लम्हों से, तुमसे, कल शायद आखिरी दफा इश्क हुआ था।