ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता - अस्मुरारी नंदन मिश्र

अस्मुरारी पटना के हम पाठकों के लिए नए हैं. उनको कुछ दिन पहले ही जल्दी जल्दी दो तीन बार सुनने का मौका मिला. उनकी कवितायेँ ईर्ष्या भी पैदा करती हैं और प्रभावित भी करती हैं, कवि अपनी ज़मीन पर इतने मज़बूत और इतने मंझे हुए कि प्रतिरोध अपने इंडिविजुअल शिल्प के साथ कविताओं में मैनिफेस्ट होता है.
हम उनकी कुछ कविताओं को भी इस साक्षात्कार के साथ लगा रहे हैं. उनका एक संग्रह "चांदमारी समय में" बोधि प्रकाशन से प्रकाशित से.
- अंचित


  १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की?


          ‘कविता क्या है?’ अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है| और उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा हो भी नहीं सकती| लेकिन मेरे लिए वह जगत के उद्दीपन के प्रति शाब्दिक अनुक्रिया है| जरूरी नहीं कि यह अनुक्रिया उद्दीपन के साथ लगी ही आए| लेकिन है वह यही|
मुझे हमेशा लगता रहा है कि सृजनशीलता मनुष्य की सामान्य विशेषता है| वैसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सृजनशील न रहा हो| लेकिन अभिव्यक्ति के रूप में अंतर आ जाता है| कोई किसी कलारूप को अपनाता है, तो कोई किसी विधा का हो जाता है| कलारूपों और विधाओं के चुनाव में कहीं-न-कहीं हमारे बचपन की परिस्थितियाँ और व्यक्तित्वों का बहुत बड़ा योगदान होता है| हम किसी के प्रभाव में, प्रतिक्रिया में, प्रतिच्छाया-रूप में और कभी-कभी तो पूरी तरह विरोध में आकर किसी ओर झुक जाते हैं|
तो मैंने क्यों लिखना शुरू किया इसका जवाब मेरे पास यही है कि अपनी सृजनशीलता को अभिव्यक्त करने के लिए| इसमें कुछ इगो की बात भी होती है कि देखो, मैं कुछ विशिष्ट कर रहा हूँ| मैंने जो पहला प्रयास किया था, वह सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए पाठ के बाद ‘कुछ करने के लिए’ के अंतर्गत कविता लेखन के अंतर्गत तुकबंदी रची| मुझे दुःख है कि तब मेरे हिन्दी शिक्षक ने मेरा उत्साहवर्धन नहीं किया और जब मैं उस तुकबंदी को लेकर मंच तक जाना चाहता था, तो हँसी उड़ाते हुए उन्होंने मुझे दिनकर की कविता थमा दी| वह बारह साल का बच्चा आज भी दिनकर से होड़ लेना चाहता है| खैर|

२. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?

२.       पठन का रचना में बहुत योगदान है| रचने में भी और बाद में उसकी अपनी पहली आलोचना में भी| पठन हमारे ज्ञान और विवेक को बढाता है, लेखन के लिए यह बेहद जरुरी है| कविता के सन्दर्भ में आप कविताओं को पढ़कर अनेक लय को पकड़ना सीखते हैं और भाषा की कई विशिष्टताओं से अवगत होते हैं| साथ ही यह भी जानना जरुरी होता है कि अन्य लोग कैसे लिखते रहे और लिख रहे हैं? आप बहुत अच्छा लिखते हों, लेकिन यदि ‘राम की शक्तिपूजा’ का ही पुनर्लेखन कर रहे हों, तब वह ठहरा हुआ लेखन ही कहलायेगा|
यह तो स्पष्ट है कि अन्य जीवंत अनुभव ही साहित्य रचते हैं, लेकिन पठन की अपनी बड़ी महत्ता है|


३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?

३.       पहली पढी हुई कविता याद करूँ तो किसी कक्षा में पढ़ी कविता याद आती है-किसान| “नहीं हुआ है अभी सवेरा पूरब की लाली पहचान/ चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ गया किसान|.....”
मुझे उस समय अपनी पाठ्य-पुस्तक, दीदी की पुस्तक और चच्चा-पिताजी की पुस्तक से पढी गयी कई कविताएँ याद हैं|
प्रिय कविता में किसी एक कविता का नाम लेना कठिन है| अनेक तरह की कविताएँ याद आ रही हैं, किन्तु उनमें से एक को ही चुनना हो तब ‘राम की शक्तिपूजा’ को कहूँगा|
कवि के सन्दर्भ में भी यही बात है, लेकिन यहाँ निराला को बताने में किसी तरह का ऊहापोह नहीं है|
४.    




           ४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?

 देखिए प्रासंगिकता तो है ही और बनी भी रहेगी| उसे नकारा नहीं जा सकता लेकिन यह सवाल मेरे लिए बहुत कठिन सवाल है| कभी लगता है कि कविता की भूमिका निःसंदेह रूप से महत्त्वपूर्ण है- समाज के लिए भी और व्यक्ति के लिए भी| कभी लगता है कि ऐसा कहकर मानो मैं खुद को ही एक संतोष में रखना चाहता हूँ, खुद को दिलासा दिलाने की तरह| जमीन पर मैं समाज को घोर कविता-विरोधी देखता हूँ| मैं अपनी कविताओं के साथ कई मुद्दों पर बस तूती की आवाज बना रह जाता हूँ, और समाज का नक्कारखाना किसी अन्य आवाज से गूंजता और संचालित होता चला जाता है| लेकिन फिर कभी नए बच्चों के साथ बात करते हुए कविताओं के साथ जाता हूँ तो पाता हूँ कि उनसे संवाद करने में ज्यादा सफल हो रहा हूँ|
तो यह मेरे लिए उलझन से भरी स्थिति है| और इस स्थिति को एक कवि का अपनी ही कविता के प्रति उम्मीद और अविश्वास के संयुक्त भाव के रूप में दर्ज किया जाए|

५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?

 कोई तरीका नहीं है और यह मेरे लिए बहुत अफसोस की बात नहीं है| कभी-कभी अफसोस जैसा लगता भी जरूर है, लेकिन उसे स्थायी नहीं कहा जा सकता|
दरअसल जब मैं बीए कर रहा था, तो हमारे एक शिक्षक ने मानो एक मन्त्र ही दिया कि ‘हर सप्ताह एक किताब तो जरुर पढ़ जाओ|’ जब मैंने यह कहा कि ‘कई किताबें समझ के ऊपर से निकल जाती हैं’, तो उनका कहना था कि ‘उस अवस्था में उसे पढ़ने भर के लिए पढ़ जाओ| क्या पता उसका कोई अंश ही समझ में आ जाए और अपना-सा लगने लगे|’ तब से वैसे ही पढ़ता जा रहा हूँ|
मैं किसी से कोई किताब लेकर यदि लौटाने में देर करूँ तो यही समझा जाना चाहिए कि पढ़ने में किसी तरह की अड़चन आ रही है, लेकिन पूरा पढ़े बिना रहना नही चाह रहा हूँ|

६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

 पहले नहीं, लेकिन अब लिखते हुए शिल्प पर भी सोचता जाता हूँ| एकदम से साथ-साथ तो नहीं, लेकिन लिख-लिख कर उसे पुनः देखने के क्रम में| कभी-कभी दो-दो शिल्प में एक ही चीज रच डालता हूँ, फिर देखना पड़ता है|
यहाँ यह बताना जरूरी समझता हूँ कि मैंने अभी तक न ही किसी विशिष्ट शिल्प को अपनाया है और न ही रचा है, जिससे पहचाना जाऊँ| तो यह शिल्प-चर्चा सामान्य रचना-प्रक्रिया के अंतर्गत ही मानी जाए|
७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 महत्त्वाकांक्षा!पहले कवि बनना चाहता था और खूब कविताएँ लिखता चला जाता था| अब कविता लिखना चाहता हूँ तो लिख नहीं पाता; दिनों-महीनों अटका पड़ा रहता हूँ|
महत्त्वाकांक्षा इससे स्पष्ट हुई? शायद प्रसिद्धि... शायद अमरता...बचपन से इतने कम में गुजारा किया कि पैसा मेरे लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं रहा| बस खाने-पहनने की चिंता से दूर रहने भर आ जाए|
८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 क्या मैं इस लायक हो गया कि सलाह दे सकूं?
लेखन के लिए ज्यादा सलाह मत लीजिए| लिखते जाइए| वैसे भी मैं सलाह देने की स्थिति में खुद को नहीं पाता| न पुराना हूँ और न ही कोई बड़ा नाम या प्रतिभा| किसी रचना पर टिप्पणी कर सकता हूँ, उसमें सलाह भी हो सकती है; लेकिन कुल लेखन के लिए कोई सलाह नहीं दे सकता|

९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?    


  कविताएँ लगातार पढ़ता रहता हूँ| दुहरा-दुहराकर| गद्य में अब उपन्यास-कहानी से अधिक विचार-साहित्य और आत्मकथा पढ़ना ज्यादा अच्छा लगने लगा है| इधर मुक्तिबोध की कविताएँ पुनः-पुनः पढ़ रहा हूँ, साथ में कुँवर नारायण भी हैं| सामने राहुल सांकृत्यायन हैं| लोहिया की किताबें खरीद कर लाया हूँ, और अम्बेडकर साहित्य डाउनलोड किया है| हां, माओ भी मिल गए हैं| साथ में नयी-पुरानी कविताएँ चलती रहेंगी| आपने अभी के बारे में सवाल किया, मैं आगामी योजना के विषय में भी बता चुका|
मैं समझता हूँ कि हिंदी के पाठक को प्रेमचंद,निराला(कविताएँ), राहुल सांकृत्यायन, रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध को बार-बार पढ़ना चाहिए|
किताबों की सूची तो लंबी है- राग-विराग(रामविलास शर्मा द्वारा संपादित निराला की कविताएँ), मैक्सिम गोर्की की आत्मकथा के तीनों खंड, गोदान, गबन और रंगभूमि, रागदरबारी, साये में धुप, अंधा युग, तमस आदि|


                  अस्मुरारी की कुछ कवितायेँ 



चांदमारी
(1)     
..............

उस अनाम अनचीन्हे
पुतले पर
गोली चलाते-चलाते जवान
चीन्हना ही भूल गया है
वह नहीं देखता पुतला या और कुछ
वह चीन्हता है केवल एक शब्द 'शूट'
और चलाता चला जाता है गोली
दनादन
सामने फिर बुद्ध या गाँधी ही क्यों न हों


चांदमारी 
  (2)
.............

भारत
पाकिस्तान
या दूर देश अमेरिका-इंगलैंड
हर जगह होते हैं
एक ही पुतले
जिस पर निशाना साध कर सीखते हैं
अलग-अलग देशों के अलग-अलग जवान
अपने कौशल

गोली खानेवाला पुतला एक ही होता है
हर जगह




गूँगा
......
1.
बेल्ट की सटसट
कहीं तेज थी
उसकी कई मिली जुली आवाजों से
गुंगिआया
सिसका
और चुप हो लिया
उसके गूँगे पन को पूरी सार्थकता देता
पसरा था
बस्ती का शालीन बहरापन..

2
उसके पास आवाज है
व्याकरण नहीं है
अर्थ है समूल
बरतने का आचरण नहीं है 
हर जगह जीता अपनी ही भाषा में
तानाशाह समय में
यही तो मरण है..


3.
समझ की पहुँच से
काफी दूरी है 
उसकी हर भंगिमा मानो आधी अधूरी है
फिर भी सहला रहे जो
बेमेल इशारों को
उनके लिए वह फकत सस्ती मजूरी है


4
खुद से ही तड़ीपार कोई देस है
आज अदालत में पेश है
भाषा तो है
पर आशा नहीं
इसलिए चुप है
अंधेरा घुप्प है...






मरना नहीं चाहता
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तुम्हारे पास फूल है, तितली है, चिड़िया है
तुम्हारे पास बीज है, अंकुर है, फसलें हैं
हवा-पानी, साँस-प्यास सब है तुम्हारे पास
तुम्हारे पास स्वाद है, तृप्ति है
रंग, प्रकाश और आँखें
पूरा का पूरा जीवन है तुम्हारे पास
ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता

तुम्हारे पास काँटों के जाल हैं
खर-पतवार है, वीरान मरुथल है
कीचड़ है, दलदल है, धुआँ है
जीभ जला देने वाले अम्ल हैं
बारुद और चिनगारी दोनों है तुम्हारे पास एक साथ
पल भर में तुझे ही खत्म कर देने वाले आग्नेयास्त्र हैं
ओ दुनिया! तुझे इस हालत में छोड़कर
मैं मरना नहीं चाहता...



लड़कियाँ प्यार कर रही हैं
…………………………………......


खिडकियों में लगाई जा रही हैं
मजबूत जालियाँ
परदे को किया जा रहा है
चाक-चौबंद
दरवाजे को दी जा रही है सीख
किस दबाव से खुलना है किससे नहीं
गढ़ी जा रही हैं घर की परिभाषाएँ
बतलाया जा रहा है दहलीज का अर्थ
ढोल पर गायी जा रही हैं तहजीबें
बड़े-बड़े धर्मज्ञानी लेकर बैठ चुके हैं धर्म की किताबें
पंडित - मुल्ला सभी हो गए हैं एक मत
सख्त की जा रही है फतवों की भाषा
कवि गा रहे हैं लाज लिपटे सौन्दर्य के गीत

शान चढ़  तेज हो रही हैं
नजरों की तलवारें
पूरी भीड़ धावा बोल चुकी है बसंत, बादल, स्वप्न पर
पार्कों में पहरे दे रहे हैं मुस्तैद जवान
गुलाब की खुशबू घोषित हो चुकी है जहरीली
चौराहों पर जमा हो रहे हैं ईंट-पत्थर
शीशियों में भरी जा चुकी हैं उबलती तेजाब

चमकाई जा रही है पिताओं की पगड़ी
रंगी जा रही है भाइयों की मूछें
जिम्मेदारों की एक पूरी मंडली
कर रही है संजीदा बहसें
खचाखच भरी खाप पंचायत में
सुनाई जा रही है
सभ्यता के सबसे जघन्य अपराध की सजा

और इनसब के बावजूद
लड़कियाँ प्यार कर रही हैं...