गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव कविता और थिएटर से ख़ूब जुड़े हुए हैं, उनकी कविताएँ कई जगह प्रकाशित हैं और कई नाटकों का निर्देशन भी उन्होंने किया है. पिछले दस साल से लगातार लिख रहे हैं और कविता पोस्टर भी बनाते हैं. लिखने की प्रेरणा के बारे में कहते हैं - "पिता लेखन से जुड़े थे, वहीँ से लिखने की प्रेरणा मिली , 14 साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी."

अमृता और साहिर के लिए

 (कवि का नोट : - ये तीन कवितायेँ एक श्रृंखला की हैं जिसमें अब तक 38 लिखी जा चुकी हैं अमृता और साहिर की ज़मीन पर इन्हें लिखा गया है।।)

1. 

 सुनो अमृता !! तन की थकन को टूटने की हद तक बरदाश्त कर सकता हूँ बहुत-बहुत बार पहले भी टूटा तो हूँ पर बिखरा नही अब तक हर बार किसी न किसी के लिए समेट लिया ख़ुद को चुपचाप हर बार कुछ कम रह गया लेकिन जितनी बार ख़ुद को समेटा अपना कुछ हिस्सा शायद खोता गया हर बार और अब इतना कम रह गया हूँ ख़ुद में कि टूटता नही हूँ - सीधा बिखर जाता हूँ मन की थकन ऐसे ही होती है अमृता !! तुमने मन को जोड़ना सीखा है क्या ?? सुनो, मन का माथा चूमना कभी आत्मा के गाल लाल हो जाते हैं, सच्ची और इसकी लालरी कहीं नही दिखती मन पर लव बाइट बन जाती है दो लोगों को ही दिखती है ये बस कई बार एक को ही तुम्हारी आत्मा का गोरापन यूँही नही सुहाता मुझे एक कत्थई लव बाइट बनानी है वहाँ गाढ़ी और चिरस्थायी ये मेरे छोटे से घर की नेमप्लेट होगी मेरा घर तो पता है न !! ----------------------------------------------------------- - 2. 

 सुनो अमृता !! देर शाम नीम अँधेरे में जब सूरज घर पहुँच कर मुँह हाथ धो चुका हो और चाँद आने की तैयारी में लगा हो जैसे नाईट शिफ़्ट पर जाने से पहले तैयार होता है कोई वक़्त के इसी पल में ज्यादातर घरों में जब डिनर की तैयारी हो रही हो और A 39 के बाहर लगे सफ़ेद गुलहड़ों ने तुनक कर समेट लिया हो ख़ुद को ख़ुद में जैसे उस रोज़ तुमने समेट लिया था ख़ुद को और लाख कहने पर नही मिलायी थी मुझसे नज़रें दरसल मैं अपनी मौजूदगी की शर्म नापना चाहता था तुम्हारी आँखों में मैं तुम्हारी उँगलियों की पंखुड़ियों को खोल देना चाहता हूँ अपनी हथेली की गर्माहट से होंठो के पास लाकर चूमना चाहता हूँ और घोल देना चाहता हूँ इनमे अपनी साँसों की महक को तुम भी चाहो तो कर सकते हो ऐसा ही कुछ या आज़मा सकते हो वो नया हुनर जो हाल ही में तुमने मुझसे सीखा है लेकिन मैं मानता हूँ कि अभी हुनर को निखारने की गुंजाइश बाकी है बहुत पेड़ की टहनियों के बीच से झाँकती लाइट जब दिखाई थी तुम्हे तुमने यकायक कहा था तुम इस अँधेरे में सुनसान रस्ते पर कहीं दूर तक चलना चाहोगी मेरे साथ ठीक उसी पल से मैं जंगल हुआ जाता हूँ जहाँ से गुम हुई जाती है वो जंगली ख़ुशबू वो जो घुली थी उस रोज़ हवा में सुबह की सारी बेवकूफियां दरसअल इस खुशबू को ढूंढने की कवायद भर थी मैं जंगल हो गया था अकेला बेंच पर अकेले बैठने से डर लगता है मुझे हर मंज़र के कितने पसमंज़र होते हैं !! --------------------------------------------------------------- 3. सुनो अमृता!! कोई भी कविता बहुत अंदर से उपजती है अंतस की तलहटी से वहाँ से जहाँ से नीचे कुछ और नही होता इसीलिए जब अंत में कुछ नही बचता कविता बचती है इसका उपजना इसका आना वैसा ही है जैसे अचानक किसी दरार से नज़र आये कोई नन्ही कोपल सी या सर के ऊपर से गुज़र जाए जहाज़ इनका होना तय नही होता कमोबेश मेरे लिए तो मैं इन्हें खोदकर नही निकाल सकता ये फुहार सा बरस जाती हैं जैसे कल हम एक दुसरे पर बरस गये थे न बादल आये थे न बदली हुई थी अचानक फुहारें आयीं और दोनों के मन भीग गए थे तुमसे दूर होकर कुछ नही लिखा जाता तुम्हारा ह्रदय रस है तुम्हारे चुम्बन शब्द हैं तुम्हारी पीठ कागज़ तुम्हारी गन्ध शिल्प है तुम्हारी आँखें अलंकार तुम्हारे बाल समास हैं और तुम्हारी देह व्याकरण माफ़ करना इन सबके बग़ैर कविता क्यूँकर होगी बोलो !!