'वो बात जिसका फ़साने में जिक्र न था/वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है'- कुमार राहुल

मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' पढ़ने बैठेंगे तो फैज़ के इस शेर से सहमत हो जायेंगे । मगर दुर्भाग्य से हमारे पास भारत को देखने के अब दो नज़रियेे थे - दो हज़ार चौदह के पहले और दो हज़ार चौदह के बाद । हम जो अब 'अतिसंवेदनशीलता' के दौर से गुज़र रहे हैं इसको कई तरह से देख और समझ सकते हैं ; इसकी व्याख्या कर सकते हैं । मसलन आजकल मैं इसे देश में बढ़ती बेरोजगारी के दुष्प्रभाव के रूप में भी देखता हूँ । ख़ैर, देश में वैविध्य है तो विवाद भी है । बहुत देर तक इससे बचा नहीं जा सकता । समय बदलेगा तो समय का मिज़ाज़ भी बदलेगा । किसके हक़ में और किसके हक़ को मार के बदलेगा ये अलग विषय है ।

कला और संस्कृति का सदियों से सम्मान करने वाले , सहेज़ के रखने वाले देश की भाषा कब इतनी हलकी हो गयी पता ही नहीं चला । देश में सुनने-सहने की प्रवृत्ति में जिस तरह से गिरावट आयी है उसमें ये आशा तो नहीं की जा सकती मगर क्या ही अच्छा होता कि हम एक बार संजय लीला भंसाली की आगामी फ़िल्म को देखने के बाद किसी निष्कर्ष पे पहुँचते ।

जरुरत है थोड़ा धीर धरते हुए समस्या के मूल में जाने की । किसी के कहे-सुने में आने से पहले खुद से खुद में विश्लेषण करने की । कुछ और नहीं तो अपने दस्तावेजों , किताबों की तरफ तो लौट ही सकते हैं हम (हालाँकि इतिहास और किताबों की सत्यता और प्रमाणिकता भी पिछले कई वर्षों से कटघरे में है) ।

इस बार भी जो विवाद बढ़ा तो लगा कि अच्छा मौका है इस अद्भुत काव्य रचना का दुबारा से रसास्वादन करने का । सो राजा-सुआ संवाद खंड, जोगी खंड, पद्मावती-रत्नसेन भेंट खंड, नागमती-पद्मावती विवाद खंड आदि पढ़ने की उत्सुकता फिर से हिलोड़ मारने लगी ।

अवधि भाषा में रचे इस काव्य के माध्यम से कवि ने प्रेम, बैराग और समर्पण के उच्च मापदंडों की अद्भुत व्याख्या की है । पद्मावती के बहाने से भारतीय संस्कृति का भी सबसे समृद्ध रूप सामने आता है (ख़ैर, होने को एक वाद-विवाद प्रतियोगिता इसपे भी करायी जा सकती है कि जिस सतीत्व और जौहर प्रथा का इतना गुणगान किया जा रहा है वो स्वयं में कितनी उचित रही है)। पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि कैसे जनता की उक्तियाँ, भावनाएं, और मान्यताएँ स्वयं छंद में बंध कर काव्य में गुंथ गयी हों । कहते हैं कि तुलसी का रामचरितमानस उस समय तक अस्तित्व में न आया था । किन्तु रामकथा अवध के ग्रामों में लोगों की जीभ पर थी । जायसी ने जनता के स्तर से ही रामकथा का संग्रह कर के लगभग सौ बार पद्मावत में उसका उल्लेख किया है ।

चौपाइयों और दोहों के सानिध्य से कवि ने जैसेे इक नयी शैली खोज निकाली हो । भाषा एकबारगी आपको सरल लग सकती है मगर जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते चलेंगे आप ये महसूस करेंगे कि भाषा कई जगह अपभ्रंश होते हुए भी कैसे क्लिष्ट है और अपने अंदर गूढ़ अर्थ समेटे हुए है । अलंकारों और व्यंजनाओं के अनूठे प्रयोग पाठक के मन पे एक अमिट छाप छोड़ती हैं । उदाहरण के लिए एक जगह राजा रत्नसेन कहते हैं, "प्रेम में वही गुण है जो पानी में है । दोनों में एक सी कला है । पानी मृत व्यक्ती को डुबोता नहीं, अपने ऊपर तैरा कर बहा ले जाता है । मैं जानकर प्रेम समुद्र में पड़ा हूँ । वह मुझे डूबा नहीं सकता । उसी के सहारे बहता हुआ जहाँ ले जायेगा वहाँ जा पहुँचूँगा ।"

इस काव्य में जायसी स्वयं भी यह मानते हैं कि रत्नसेन और अलाउद्दीन का संघर्ष दो जातियों की टक्कर नहीं , बल्कि दो आदर्शों की टक्कर है , जो मानव जाति में सदा से रही है ।

कहते हैं अंत में कुछ भी नहीं बचता और शायद इसलिए जायसी जब अपनी इस अनूठी काव्य कृति में ये पूछते हैं कि कहाँ है वो वीर रत्नसेन ? कहाँ है वो बुद्धिमान सुग्गा ? कहाँ हैं वो अलाउदीन ? कहाँ है सुंदरी पद्मावती ? ....तो लगता है कि अब भी कितने प्रासंगिक हैं ये प्रश्न !

जायसी के ही शब्दों में - "कोई नहीं रहा । जग में कहानी भर रह गयी ।"

- कुमार राहुल

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