युवा कविता #16 नीरज प्रियदर्शी




नीरज प्रियदर्शी परवरिश भोजपुर के गांव में हुई है, इसीलिए रंग दिखता है । पिता अब दर्शनशास्त्र के लेक्चरर हैं।तब ठेठ किसान थे। इन्हीं की सोहबत ने पहले पढ़ना सिखाया और फिर लिखना। अब तो उम्मीद भी करने लगे हैं। कहते हैं- कुछ भी लिखो, मगर ऐसा लिखो कि वो कागज किसी के हाथ आए तो आईने सा लगे। तुम्हारे खुद के भी । जब भी लिखता हूं, किसी न किसी के वास्ते ही लिखता हूं। और वास्ते का क्या है! किसी से भी हो जाता है। पेशे से पत्रकार हूं। हर दफे बस यही चाहता हूं कि कागज पर सिर्फ कविताएँ लिखूं, मगर नौकरी ने उसी कागज पर लूट, हत्या और बलात्कार लिखवा दिए। अब नौकरी छोड़ दी है। मन का लिखता हूं। मन करता है हर बार कविता ही लिखूं। विचार अघोर है, सो हर बार प्रेम पर अटक जाता है । हर बार प्रेम भी हो जाता है।







मुमकिन नहीं था 'के मुमकिन नहीं था तुम्हारा आना फिर से उदास कमरे में ये सिर्फ हम नहीं वरन, समझती है हमारी रात भी मुझसे ही खफा है घुप्प बैठी है मुझसे पूछ के सिर्फ़ मेरी ही होकर कैसे गुजर सकती है जबकि पहर बाकी है अभी। शहर छोटा है जब सोता है तब ख्वाब बुनता है और जुगत भिड़ाता है इक और शहर बनाने की खिड़की भर नजर बड़ी है पूरे शहर को नाप लेती है स्याह गगन का चांद दूर टिमटिमाता है, मगर खिड़की में समा जाता है अगले पहर का साथी है।


 संपादक से अरज 

ए संपादक एक काम करिए भावनाओं को डाल लीजिए कहाँ ? वहीं...! उसी तरह, जैसे डाल लिया है पर्दा, इतिहास पर भरी जवानी पर शब्दों के सार्थकता पर। शर्म तो आती नहीं आपको दामन लुटाने में अखबार बेचने में खबरें खरीदने में जैसे कि, मान लिया हो नंगा हो जाना फिर पैसे कमाना बुरा तो है उसी तरह जैसे वैश्यालय में औरते हैं तो हैं मगर, जरूरत......! खैर.... ए संपादक एक बार बोलिए ना जरुरत क्या है ?

 धरती के सारे पात्र काल्पनिक हैं इस मुर्दाघर में तुम्हारे चप्पल की जोड़ी भी नहीं पहुंचती जिसे लगाकर तुमने नाप ली थी अपने हिस्से भर की जमीन। इस मुर्दाघर में देह से लिपटी बनियान ओर उसे ढकने वाली कमीज तार-तार हो गई होती है कभी बटन नहीं होते तो कभी छलनी हुआ हृदय उस चिथड़े में साफ नजर आता है। इस मुर्दाघर में रूह कंपा देने वाली सड़ांध भेद देती है तुम्हारी परफ्यूम और डीओ की महक जिसमें मदहोश होकर निकले थे अहले सुबह तुम आज उसी इत्र की खुशबू किसी का तुमसे लिपट जाने का ख्वाब सब कम पड जाता है जब लोग पांच कदम के फासले को तु्मसे मिलने की शर्त बना बैठे हैं। इस मुर्दाघर में काश तुम्हारी आँखें खुली होतीं तुम देखते ये विद्रुप और विभत्स नजारे फर्श पर बिखरे मांस के लोथड़े सिराहने पड़ा बेधड़क सकुचाया सा दिल तुम पर हर नजर के बाद थूकता अपना ही बाप उरोजों को सहलाने वाला वो डॉक्टर आज नंगी जांघें देखकर भी स्पर्श करने की हिमाकत नहीं करता तुम्हें विजय की खुशी होती देखकर। इस मुर्दाघर में तुम उठ के बैठते जरा सा इक बार हर सुबह को चाय लाने वाली पत्नी इंतजार कर रही है बाहर कफन के साथ बचपन में तुम्हारी मैली चड्ढी धोने वाली मां नाक पर रूमाल लगा लेती है तुम्हारे ही जिस्म की महक से। इस मुर्दाघर में काश तुम सच देख पाते दर्द महसूस करते ये सोचकर कि इस धरती के सभी पात्र काल्पनिक हैं जिन्हें तुम हकीकत मान बैठे थे अब जान पड़ेगा कि बाहों में भरने को आतुर वो अब छुआने से भी परेहज करती है।