युवा कविता #17 शालिनी झा

शालिनी झा - मुझे ठीक से याद नहीं , मैं कब लिखने लगी, पहले छोटे छोटे भाषण और फिर कविताएँ और फिर ये सिलसिला जारी है. कविता लिखना मेरे लिए संगीत सुनने जैसा है! जैसे आप किसी गाने को बस सुनते हैं . उसमे से आवाज़ , ताल , सुर अलग किए बिना,बिना ज़्यादा सोचे समझे! एक पूरा गाना महसूस करते हैं और उस के बाद कमाल की तसल्ली मिलती है | वैसे ही मैं कविताएँ सोच के नहीं लिखती , कोशिश नहीं करती, बस जब कहीं तसल्ली नहीं मिलती, जब आँसू बाहर नही आ पाते, जब खुशी संभाली नहीं जाती और जब मन चुपचाप होता है तो कविताएँ बन जाती हैं .ऐसे ही! और फिर कविता पूरी होने पर जो सुकून मिलता है शायद वही ज़िंदगी है.

कुछ सोच रही हूं मैं 

वो रात नहीं दिन भी तो नहीं एक शाम अधूरी बाकी थी गिरती थी मोती की बूंदे आंसू के फूलों को थामें वो धूप नहीं ना छांव ही थी एक सांस अधूरी बाकी थी रोका तो था पर टूट गया एक ख्वाब हवा के झोंको सा एक चुप्पी की चादर ओढ़े समेट रही उस खुशबू को कुछ सोच रही हूं मैं खामोशी है...एक सिसकी है शायद छोटी सी उलझन है वो कौन है जो , कुछ भी नहीं पर मेरा भाग्य विधाता है है किस भाषा के शब्द जिन्हें पीड़ा से शक्ति मिलती है मुस्कान नहीं , रोना भी नहीं एक चोट अभी भी बाकी है वो चला गया, हां रूका नहीं उन कदमों की आहटों में कुछ खोज रही हूं मैं.. एक पीड़ा है , जीवन भर की एक सपना था, मेरा मन का जैसे सर्दी की ठंडक हो पहले जीवन की आशा हो अब तुम तो नहीं, हां मैं भी नहीं बस हम थोड़े से बाकी है तुम दिखते हो, हां ! अब भी तो वह प्यारी सी मुस्कान लिए जीवन के उस छोर पर आंखों में मेरे प्राण लिए उन आंखों से ही बांधी हुई अब जी रही हूं मैं उन्हें सोच रही हूं मैं.


 तुम ही हो  

तुम सांस मेरी इन पलकों की, इन लहरों की तुम धड़कन हो। कैसे रोकूँ इन आँखों को, चल पड़ती हैं तुमको छूने। ज्योति हो मेरे अधरों की, आकाश मेरा- हाँ तुम ही हो। . मीठी सी महक हो, तन-मन की, मेरी पायल की गुंजन हो। जो सुनी नहीं खुद मैनें भी, उन साज़ों की आवाज़ तुम्हीं। जो बाँध रही मुझे बंधन में, वह प्यास मेरी- हाँ तुम ही हो। हो प्यार मेरा, संसार मेरा, जैसे हाथों का कंगन हो। तुम जादू हो, मैं खो सी गई, मेरे जीवन का सार तुम्हीं। जो दूर भी है, पर जान मेरी, ऐसा विश्वास- हाँ तुम ही हो। रुक जाओ, ऐसे जाओ मत, मैं खड़ी मिलूंगी यहीं तुम्हें। तुम मानो, चाहे ना मानो, मेरी राह तुम्हीं, अधिकार तुम्हीं। यह प्राण जुड़े इन नैनों से, प्रकाश मेरा- हाँ तुम ही हो। संसार की सीमा भूल गई, अस्तित्व मेरा अब तुम से है। यह आँचल उनकी छाया है, जिस खुशबू के, हक़दार तुम्हीं। मृत्यु का अब भय कैसा, मैं बस तुमको ही देख रही। पूजा के फूलों को लेकर, तुम लज्जा हो मेरी आत्मा हो। हाँ ईश्वर मेरे- अब तुम ही हो।