युवा कविता #18 अभिषेक

अभिषेक कहते हैं कि कविता उनके लिए एक हॉबी की तरह है जैसे दूसरी चीज़ें हैं मसलन भाषण और क्विज़.उन्होंने कई लेख लिखे हैं और अपना एक पर्सनल ब्लॉग भी चलाते हैं.

मुझे दूर ले चलो।

मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो। किसी ऐसी जगह, जहाँ आईने न हों। जहाँ दुनिया के बेड़ियों के मायने ने हों। जहाँ रुख़्सत लेने की विवशता न हो, जहाँ फ़ुर्सत से हम गुफ़्तगू कर सकें। जहाँ सपनो पर किसी का पहरा न हो, जहाँ ज़ख्म तो हो, पर गहरा न हो। जहाँ हो कर बेख़ौफ़ कह सकूँ दिल की बातें, जहाँ दिन भी हमारा, हमारी हो रातें। मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो।


 एक गाँव था। एक गांव था, दूर तराई में। बसा घाटियों की गहराई में। थे लोग वहां के प्यारे से, किसी विस्मय भरे नज़ारे से। एक लड़की थोड़ी सहमी थी, और गांव में गहमा-गहमी थी। कुछ लोग खड़े थे मीनारों पर, कुछ दूर नदी के किनारों पर। जो लोग खड़े थे मीनारों पे, वो लैश थे हथियारों से। कुछ नदी किनारे,खाली हाथ, थे सिसक रहेेे लाचारों से। फिर गोली चली और दिल टूटे। न जाने कितने घर लुटे। एक घाटी फिर ज़रखेज़ हुई, और बातें सनसनीखेज़ हुई। थे पंडित घाटी से भाग रहे, अपनी आँखों में आग लिए। उनके पडोसी चिंतित थे, पसोपेक्ष का दिल में राग लिए। वो जानते थे,ये गलत है, जो भी हो रहा है। एक भाई ज़मीरे-ज़र्ब है, और दूजा रो रहा है। इन्सानियत का भी इल्म न हुआ, सरकार-ऐ-जम्हूरियत को। थे गाँव के गाँव उजड़ रहे, और वो थामे रह गए हुर्रियत को। सरकार-ऐ-जम्हूरियत उस दिन, चद्दर तान के सो गयी। पर न जाने उस दिन, उस साल, आने वाले कितने सालो तक, कितने ही गाँव उजड़े, दिल टूटे, और कितनि ही रूहें दफ़्न हो गयी। एक गाँव था तराई में। बसा घाटियों की गहराई में।