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Showing posts from 2018

गोधुली में आसमान - अंचित

उसकी देह से सटते ही, उसकी पीठ का ठंडापन मेरे सीने पर मुझे महसूस हुआ, उसकी कोमलता भी. उसकी गर्दन का पसीना मेरे होंठों पर लग गया. वह कसमसाती हुई सी मुस्कुराई. उसकी बाँहों ने खिड़की के लोहे के सींख़चे थामे हुए थे. वह पूरी नग्न नहीं थी.उसने कमर पर एक चादर बाँधी हुई थी. उसकी आँखें सामने मैदान को देख रही थीं. उसके बाल एक जूड़े में सिमटे हुए. बाहर अंधेरा था, उतना जितना पूर्णिमा से तीन चार दिन पहले होता है. कमरे में उतनी रौशनी भी नहीं थी. चाँद अगर आसमान में रहा भी होगा, दिखता नहीं था.उसकी देह ठण्डी हवा से सटकर लजा लजा जाती. 
जब उसकी गर्दन दो तीन बार चूम लेने के बाद, मैंने उसके साँवले कंधे से ठोड़ी टिकाई तो उसने हँस कर कहा, “तुम्हें चूमना नहीं आता.तुम्हारे चुम्बन सूखे हुए होते हैं, ऐसे जैसे सीने का आवेश होठों तक पहुँचा ही नहीं." ***
 आज चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन था. 48 घंटों के बाद चुनाव होना था और इतने दिनों में हालात इस क़दर तनावपूर्ण हो गए थे कि आख़िर बम फूट ही गया.  बड़े नेता हाल ही यूनिवर्सिटी आकर गए थे और आख़िरकार रूलिंग पार्टी यह मान कर चल र…

Editorial post - Amidst all the horrors, the real horror is the realization of our own guilt : Asiya Naqvi

I unlocked my laptop and the moment I typed "jai hind", my password, I was questioned by my ghoul,
'Are you a muslim?' or  'Are you a nationalist?'

you must be thinking what this ghoul is?

This web series is about a demon  which was called by a helpless human being when he failed to made his daughter understand the difference between patriotism and jingoism.
A man named shahnawaz Rahim who questioned the way of the mission of' wapasi  'of those who had mentally  crossed the boundary set  by the nationals but were living inside the nation.'

A Ghoul exists in  everyone regardless of caste,creed,region and religion but is mostly dormant.The whole series can also be taken as a thriller and scary drama but it had a deeper implication where the ghoul is nothing but the guilty conscience projected as the most repulsive image which can instill instant cacophobia.

Amidst all the horrors, the real horror is the realization of our own guilt.
we need to fight wi…

आज चंद्र्ग्रहण है - निशान्त

आजतक वह यह नहीं समझ पाया था कि कलकत्ता एक महानगर है या कई छोटे-छोटे गाँवों से मिलकर बना एक नगर जिसका किसी ने केन्द्रीयकरण कर दिया हो. देबा कलकत्ता इस मर्तबा आठ सालों बाद लौटा था. आठ साल में कलकत्ता के राजनीतिक नारे भले ही बदल गये, लेकिन कलकत्ता शायद ही बदल पाया.  स्टेशन पर वही भीड़भाड़, संकरी गलियां, कालीघाट की ओर जाने वाली सुरंग उसी हाल में कराहती नजर आ रही थी. सड़क पर बैठे तांत्रिक जो दस रुपए में भविष्य देखने का दावा आज भी कर रहे हैं, जो आज भी अपने आपको कामख्या से सिद्ध होकर आया हुए बताना नहीं भूले.  मांसल शरीर वाली बंगाली औरतें जो आज भी भर मांग सिंदूर करती हैं और कम उम्र की जवान होती लड़कियां आज भी अपने माथे पर बिंदी लगाना नहीं भूली हैं. किसी भी किताब-कॉपी के दुकान पर शरतचंद्र की किताबें प्रथम पंक्ति में आज भी उसी तरह विराजमान है जैसे कि अंत तक देवदास के मन में पारो विराजमान थी.

देबा का परिवार सात पीढ़ी पहले कलकत्ता आ गया था, जैसे कि पटना, भागलपुर ,बनारस की कई बस्तियां रातोंरात कलकत्ता के हिस्से आ जाता था. देबा के परिवार के कई लोगों ने कालीघाट पर बैठकर तांत्रिक का काम किया, उसके दादा ने…

उड़ान का वह नन्हा डाकिया (कहानी)

अभिनंदन दसवीं कक्षा का छात्र है और कवितायें और कहानियाँ लिखता है। गढ़ता है चित्र और चित्रों के कई-कई मायने। आजकल के किशोर जो लिख रहे हैं या लिखना चाहते हैं, उनके लिए अभिनन्दन एक अच्छा उदाहरण हो सकता है। अभी इस उम्र में उसकी कल्पना-शक्ति प्रखर और पूर्ण-रूप से संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। 'हर्थ' पर आज प्रस्तुत है अभिनंदन की कहानी 'उड़ान का वह नन्हा डाकिया'। कहानी - उड़ान का वह नन्हा डाकियाआँखों की सफेदी में पीलापन आ चुका था ।आज फिर वह कुछ ताक रहा था । बैठा बैठा खिड़की के बाहर । छोटी सी खिड़की । मजबूती से बंद । मजबूत जालो से घिरी । उसकी पुतलियां वहीं ठहरी थी । बिल्कुल स्थिर और एकटक ।
       गुजरते बसंत की ढलती शाम । मध्दिम लाली लिए अलसाती हुई एक किरण आहिस्ता से खिड़किया पार कर कमरे में खड़ी थी। चंद सेकंड , कुछ मिनट, थोड़ी देर और बस...। सूरज ने अपनी धुप का गुच्छा समेट लिया।  आसमान बिल्कुल साफ था। खूबसूरत सा नीलापन। उसमें हल्के हल्के बादल तैर रहें थें। इन बादलों से उसे कुछ  लगाव था । कुछ खास था । वह इनकी तरह आजाद उड़ना चाहता था। पर वह इस कमरे में ...। फिर भी उसके अंदर भी बादलों …