सम्पादकीय पोस्ट : रेडियो, कभी न भूलने वाला पहाड़ा और बातें जो बस अख़बारी नहीं - उत्कर्ष



डायरी का पन्ना


आज सुबह-सुबह देखा मैंने गौरैया हलकी ओस में नहाई हुई चावल के दाने चुग रही थी। फ़रवरी। बसंत। रेडियो पर बज रहा गीत...'तुम आ गए हो, नूर आ गया है...'

पड़ोस का एक प्यारा-पर-शरारती बच्चा एक दिन मेरे घर आया और उसने बताया कि कैसे क्लास की बातें उसकी समझ में नहीं आती। उसने बताया कि अध्यापक पूरा पाठ नहीं पढ़ाते, कहते हैं मेरी कोचिंग में आ जाओ, अच्छे से समझा दूँगा। मैंने उसे बताया कि कैसे रटे से ज्यादा समझना जरुरी है। मैंने बातों ही बातों में उससे पूछा कि क्या उसे सत्रह का पहाड़ा याद है? उसने वापस पूछा कि ये पहाड़ा क्या होता है तब मुझे याद आया अंग्रेजी-माध्यम वाले बच्चे भला कैसे जानेंगे पहाड़ा। मैंने बताया फिर कि मैं 'टेबल' की बात कर रहा हूँ। उसने ना में सर हिलाया, मेरे पूछने पर उसने बताया कि कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। खैर, मैंने उसे बताया कि पहाड़ा कैसे जीवन भर काम आता है।

बचपन में प्राइमरी स्कूल से ही, बल्कि घर में ही होती थी हमारी पहाड़ा रटने की शुरुआत। आज भी गूंजती है मन में वो लयबद्ध आवाज़...दो एकम दो, दो दूनी चार। शिक्षा कब देशी से विदेशी इतनी घर कर गई समाज में कि पता ही न चला। और कब ये साधना से व्यवसाय बनी, ये भी। दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव होता है इसका। बच्चों की कॉपी में शायद ही कहीं लाल स्याही दिखाई देती है और गलतियाँ जाने कितनी! जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। ज़िन्दगी का पहाड़ा ऐसा रटाया जाता था बचपन में हमें कि भुलाये न भूले। आजकल तो यही जमा-बाकी है कि गलतियों की बात न करो!

चलिए, पन्ना पलटते हैं। वो कोई साल 2004 के पहले की बात होगी। तब गलियों की लम्बाई थोड़ी छोटी हुआ करती थी नाकि आज की तरह वीरान और लम्बी। खाली सड़कें या गलियाँ उदासी जितनी लंबी होती हैं। खैर, तो बात ये कि उसके पड़ोस के सारे गमले गेंदे के पीले खुशबूदार फूलों से भरे रहते। फेरीवाला हर-दर-दोपहर कभी बाँसुरी तो कभी मेवे तो कभी 'बम्बई-मिठाई' बेचते नज़र आता। उसके आते हीं गलियों की कितनी ही खिड़कियाँ खुलतीं और क्या बच्चे, क्या बड़े उससे खरीदते ज़िन्दगी का सामान। तब गर्मियाँ जानी-पहचानी हुआ करती थीं और जाड़े की अलाव ख़तों की तरह ख़ास। एक खिड़की पर नज़र आती गौरैया, दूसरी पर किसी अधूरे रात की कहानी। स्टेशन के बाहर खड़े रहते मुसाफिरों के इंतज़ार में पगड़ी-बांधे इक्केवाले और खुशदिल रिक्शेवाले।
एक ऐसा ज़माना जो ये आभास करवा देता कि गाड़ियों के पीछे लिखा " जगह मिलने पर पास दिया जाएगा " , जरुर पास देगा। वक़्त माने रेडियो। रेडियो माने तरानों में घुली ज़िन्दगी। और कुछ यूँ पेश होता "आपके रेडियो-सेट पर आ रहा है आपका मनपसंद गीत..." ये दिल भी कितना पागल है..."।

हम जाने कब से अखबारों में जलवायु-परिवर्तन के किस्से पढ़ते हैं। बगैर ये समझे कि वाकई कितना भयावह है ये। इस साल कई हिल-स्टेशनों में बर्फ़बारी नहीं हुई। कुछ जगहों पर सैलानियों को आकर्षित करने के लिए 'कृत्रिम-बर्फ़' का इंतज़ाम किया गया था। पर ये सोचकर भी अजीब लगता है कि प्राकृतिक अनुभवों को इस तरह बनावटी बनाकर काम चलाया जा सकता है। हम क्या दे रहे हैं वापस प्रकृति को ?
हमने ये कैसा वर्तमान चुना है और कैसे भविष्य की ओर रुख कर रहे हैं?

पिछले साल कुछ जगहों पर बर्फ़ की बजाय बारिश हुई और बाढ़ आ गई। गलियों से फेरीवाले गायब हो गए। मानसून में सड़कें धूल से पट गई। फ़रवरी कथित तौर पर प्रेम का महीना माना जाता है, तो इस महीने में आने थे पेड़ों पर मोज़र और सबकुछ ओढ़ा दिया जाना था फूलों की चादर से। रेडिओ की बैटरी ख़त्म हो जाने का कहीं मातम तो नहीं मना रहा बसंत!
और एक रुपहले पर्दों वाला दिलदार शहर असद का, कैसे डूब गया उदास धूल उड़ाती शाम में। अब पूरा शहर पहनकर घूमता है फ़िक्र के मास्क। पाटलिपुत्र से विदा किये जा चुके हैं पेड़। ये कैसे होने दिया गया कि शहरों में कम हो गए गमलों के गीतभरे फ़ूल।

आँखे बंद! देखता हूँ, पूरी गलियाँ बसंत हुई जा रही हैं। गाँव की किसी छत पर ज़ोर से बज रहा है रेडियो..." क्या मौसम आया है...(फ़िल्म-अनाड़ी, 1993)। वहीँ दूर कहीं नज़र आ रहा है साइकिल के टायर दौड़ाता कोई बच्चा और उसके पीछे लम्बी टोली। देखते-ही-देखते पूरा गाँव खलिहान बना बैठा है नए अनाज की महक ओढ़े। रेडियो पर फरमाइशी गीतों की कोई और किश्त शुरू और चारपाई पर धूप फाँकता अचार अभी-अभी डाला गया है। शहर में छतों को रंग दिया गया है खेलते बच्चों के बचपन से।

घुप्प अँधेरा। रिक्त! दूर रेगिस्तान में तेज़ी से भाग रही है मृगतृष्णा। निर्जन वीरान खड़े उस खंडहर से दूर चली जा रही है पर्यटकों की जीप। उसने सरसों के पीले फ़ूल दिसम्बर में ही देख लिए। वो अक्सर अपनी परछाई देखने दूर पहाड़ियों की ओर चला जाता है। 'कामू' एकटक देख रहा है सिसीफस को पहाड़ के ढलान पर लुढ़काते पत्थर, क्रियारत पर स्थिर।

आजकल सभी किसी यंत्रनुमा मशीनी स्लेट में नज़रें गड़ाए रहते हैं। और इस तरह खो देते हैं सूर्योदय का उल्लास और सूर्यास्त का वैभव। आपाधापी की किताबों से परे एक ज़िन्दगी आपका इंतज़ार कर रही है। वहाँ दोस्ती की बंदगी होगी। प्रकृति और आत्मा की जुगलबंदी भी। ज़िन्दगी का रेडियो जब चाहे तब समय के नगमों को ट्यून कर लेगा। बचपन वाली साईकिल पगडंडियों की ओर ले जाने को तैयार मिलेगी। बड़ों को स्कूटर कभी पुराना नहीं होगा। स्पीति में बर्फ़ की बारिश होगी।

कविताओं की तरफ़ लौटते हैं हम कहानियों के बाद। प्रेम की ओर अलसायी दिनचर्या के बाद।

"जब सब लौटते हैं
 दिन के मोहजाल में
 एक व्यस्त दिनचर्या के उपरान्त ।
 मैं लौटता हूँ
 सरसों के विषादमुक्त पीले फ़ूलों की ओर
अतीत के नेपथ्य से भोर के उजास मंच पर
अभिनय की धार लिए
मोहशून्य बालक सा
मैं लौटता हूँ।"

वहीँ रिल्के मिल जाते हैं। सोचता हूँ मोजार्ट की किसी सिम्फनी में ये गूथा हो, तो कैसा हो।

Harshness vanished. A sudden softness
has replaced the meadows' wintry grey.
Little rivulets of water changed
their singing accents. Tendernesses,

hesitantly, reach toward the earth
from space, and country lanes are showing
these unexpected subtle risings
that find expression in the empty trees.

by Rainer Maria Rilke

फिर मिलते हैं।