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Showing posts from March, 2018

युवा कविता #21 : अमर प्रताप सिंह

परिचय :  ख़ुद को बयां करना सबसे मुश्किल होता है वो भी शब्दों में।एक कोशिश करता हूँ खुद को समझाने की। पढ़ाई से ज्यादा चित खेल और भ्रमण में लगता है।पर जैसे तैसे मास्टर की डिग्री ले ली है-इतिहास में।

कविता लिखने की वजह : कविता से प्रेम बचपन में ही हुआ था।जब कविता दिखती और मिलती थी,उसे समझने और पढ़ने की काफ़ी कोशिश करता था।कविता लेखन और पठन में अज़ीब सी सुकून देने वाली एहसास की अनुभूति होती है।सो गाहे बगाहे शब्दों को तोड़ता मरोड़ता हूँ।और सामूहिक हत्या का प्रयास करता हूँ और ऐसा यकीन है कि आगे भी करता रहूँगा।


1.

चिता पर भी शांति नहीं,
मरघट भी एक बाज़ार है।
बैकुंठ धाम में भी नहीं,
मिलता आराम है।

चित,चिता,खोपड़ी और मसान,
जीवन -मृत्यु एक समान।
अर्थी से अस्थि तक रिश्ते फ़ीके पड़ते,
सर्दी में लोग चिता के पास होते,
गर्मी में छायाओं के नीचे।

जिनका मंत्रों पर अधिकार नहीं,
वे मरघट के राजा हैं।
मुखाग्नि से लेकर घाट छुड़ाना उनका काम,
पर इसके लिए भी देना होता एक मोटा दाम।
जैसी हैसियत वैसा दाम,
पर आप मोल भाव भी कर सकते हैं,
अगर आप ग्राहक अच्छे हैं।
क्योंकि मरघट भी एक बाज़ार है।

घृतलेपित मुर्दा भी सोचता है,
कभी घी शायद ही चखा जीवन …

अँचल के रेणु- निशान्त

एक

फणीश्वरनाथ रेणु  के  गाँव  जैसा  ही  हमारा  गाँव  भी  है।
आखिर  वह  कौन सी चीज़ है  जो  एक  कथाकार  या  साहित्यकार  को  कालजयी   बना  देती  है। भले  ही  इस बात  में  भारी  विरोधाभास  हो  सकता  है  कि”  एक साहित्य अमर  होता  है  या  उसको  लिखने  वाला  साहित्यकार”।  ठीक  उसी  तरह  यह  भी  कहा  जा  सकता है  कि “कथानक  अमर  होता  है या  कथाकार”।
मुझे  वह  दिन  आज भी  अच्छी  तरह  याद  है  जब  मैंने  रेणु  को  पहली  बार  पढ़ा  था। वह  दिन  शायद  फाल्गुन  मास  का  कोई  दिन  था  और  कहानी  थी ठेस। करीब  दस  वर्ष  पहले  रेणु  को  पढ़ा  और  उसके  बाद  गाँवों  को  छोड़कर  एक  शहर  में  आ जाना  और  फिर  उस  शहर  को  छोड़कर  फिर  एक  बड़े  शहर में; जहाँ  रेणु  की  कहानियों  के  पात्र  दूर-दूर  तक  नज़र  दौड़ाने  पर  भी  नहीं  दिखाई  देते।
पर  रेणु  को  देखने  के  लिए  क्या  नज़र  दौड़ाने  की  जरूरत  है?

शायद  मेरे  लिए  तो  नहीं  क्योंकि-” रेणु  को  मैं  अपने  दिल  में  लेकर  चलता  हूँ  और  अपनी  औकात  में  भी  रहता  हूँ”।
रेणु  हमारे  गाँवों  की  हवा  में  बस  गये  हैं, पतझड़  में  रेणु  बस  गये  हैं, रेणु…