अँचल के रेणु- निशान्त


एक

फणीश्वरनाथ रेणु  के  गाँव  जैसा  ही  हमारा  गाँव  भी  है।
आखिर  वह  कौन सी चीज़ है  जो  एक  कथाकार  या  साहित्यकार  को  कालजयी   बना  देती  है। भले  ही  इस बात  में  भारी  विरोधाभास  हो  सकता  है  कि”  एक साहित्य अमर  होता  है  या  उसको  लिखने  वाला  साहित्यकार”।  ठीक  उसी  तरह  यह  भी  कहा  जा  सकता है  कि “कथानक  अमर  होता  है या  कथाकार”।
मुझे  वह  दिन  आज भी  अच्छी  तरह  याद  है  जब  मैंने  रेणु  को  पहली  बार  पढ़ा  था। वह  दिन  शायद  फाल्गुन  मास  का  कोई  दिन  था  और  कहानी  थी ठेस। करीब  दस  वर्ष  पहले  रेणु  को  पढ़ा  और  उसके  बाद  गाँवों  को  छोड़कर  एक  शहर  में  आ जाना  और  फिर  उस  शहर  को  छोड़कर  फिर  एक  बड़े  शहर में; जहाँ  रेणु  की  कहानियों  के  पात्र  दूर-दूर  तक  नज़र  दौड़ाने  पर  भी  नहीं  दिखाई  देते।
पर  रेणु  को  देखने  के  लिए  क्या  नज़र  दौड़ाने  की  जरूरत  है?

शायद  मेरे  लिए  तो  नहीं  क्योंकि-” रेणु  को  मैं  अपने  दिल  में  लेकर  चलता  हूँ  और  अपनी  औकात  में  भी  रहता  हूँ”।
रेणु  हमारे  गाँवों  की  हवा  में  बस  गये  हैं, पतझड़  में  रेणु  बस  गये  हैं, रेणु  हर  आदिम  रात्रि  में  बस  गये  हैं। आँचलिकता  की  हर  बातों  में  रेणु  बस गये  हैं। न  सोनपुर मेला, न ही  चंपारण  के  गाँव  और  नहीं  गाँव  की  औरतें  रेणु  के  बिना  परिपूर्ण  है।
आखिर  हीराबाई  और  हीरामन  को  भूल  जाना  हमारे  लिए  आसान  है  क्या। हीरामन और  हीराबाई  के  बीच  की  निश्छल बातें, हमारी  सभ्यता  और  वर्तमान  के  अस्तित्व  पर  चोट  करती  बातें। कैसे  सुनसान  जगह  पर एक  अनजान  औरत  को  सिर्फ  माँस  का  एक  लोथड़ा  समझ  लिया  जाता  है।

नैना -जोगिन  कहानी  की  नायिका  जो  साक्षात  काली की  रूप  थी। उसका  एक  मर्द  से  कहना- हमको  बदनामी  से  तनिको  डर  न  लगता  है,आप  हमरा  क्या  कर  लेंगे  जी? आप  हमारा”  एथी  का  उखाड़  लीजिएगा”।
लालपान  की  बेगम कहानी  जिसमें  बैलगाड़ी  चलाने वाला  आदमी  आज  शहरों  में  ऑटो  चला  रहा  है, पर  बदला  उसके  लिए  कुछ  नहीं  है। फिलिप्स रेडियो  की  जगह  एल.जी  फ्लैटरॉन  ने  ले  ली  है, देखने वाले  का  रूप  बदल गया  है  पर  आत्मा  वही  है।
हमारा  गाँव  आज  भी  रेणु के  गाँवों  की  तरह  ही  है। वही  दालान, वही चौपाल, वही  बतकही  और  वही  गुमान  कि-“यहाँ  कोई  किसी  का एथी  नहीं  उखाड़  सकता”।

मैं  नहीं   चाहता  की  समय  जैसे  संक्रमण  की  मेरी  गाँव  पर  नज़र  पड़े। समय  गाँवों  को  खोखला  कर  देगा। गाँव  ही  रेणु  है  मेरे  लिए।

2.

रेणु जन्म  से  ही  विद्रोही  रहे  होंगे। तभी  तो  गाँव-अंचल  में  जिन  बातों  को  लोग  सकुचाकर  बोलते  हैं, उन  बातों  को  रेणु  ने  अपनी  कहानियों  में  जगह  दी। रेणु  आप  तो  किसान  थे, खेत  में  धनरोपनी करने  वाला  किसान, धान  की  मोरी  को  माथे  पर  लादकर  ढ़ोने  वाले  किसान।
आपने  जिन  पात्रों  और  लोगों  को  अपनी  कहानियों  में  जगह  दी, वह  नहीं  जानते  कि  आप  बहुत  बड़े  साहित्यकार  रहे  हैं। आपकी  ही  बातो  में ” यहाँ  कोई  किसी  को  नै  बुझता  है; सब  अपने आप  में  ही  बड़का  साहब  है”।
रेणु  आप  नहीं  जानते  कि आप गाँवों  में  किस  हद तक  बसे  हुए  हैं। मेरी  परदादी  जिनको  गुजरे  कुछ  दिन  बाद सत्रह वर्ष  हो  जायेंगे, उनमें  आप  बसे  थे। उन्होंने  आपका  नाम  नहीं  सुना  था।

पर  आपकी  सारी  कहानियां  उन्हें  याद  थीं। मैं नैसर्गिक  नटखट  था, फिर भी  हर  शाम  मुझे  दादी  के  हवाले  कर  दिया  जाता  और  कथा  सुनाने  के  पहले  वे  मुझसे  फूल  अर्पण  करवातीं, धूप  जलातीं  और  फिर  उसके  बाद  कहानियां  शुरू  करतीं। लालपान  की  बेगम  जो  तीन-चार  दिनों  तक  चलती।

कहानी  के  नायक  ने  नयी  बैलगाड़ी  खरीद ली, फिर  अपनी  मेहरिया  से  वादा  किया  कि” आज  पूरे  परिवार  के  साथ  लाखोबाई  का  नाच  देखने  चलेंगे”।  कुछ कारणवश  उसको  आने  में  देर  हो  गई  और  फिर  मेहरिया  के  नखड़े  देखने  लायक होते।
रेणु  मैं  आपसे  एक  बात  कहना  चाहता  हूँ-

आज के  समय  में  प्यार  करना  आसान  हो  गया  है क्योंकि  अपनी  नैसर्गिक  भावनाओं  को  हमलोगों  ने  सीमित  कर  दिया  है। आपके  समय  में  प्रेम  में  प्रकृति  के  कई  विविध  रूप  देखने  को  मिलते  थे, मोहब्बत  करना  आसान  नहीं  था,पैसे  नहीं  थे  शायद इसलिए  आसान नहीं  था। रेणु  आप  जानते  हैं  आजकल  की  अधिकतर  प्रेम  कहानियां  क्यूबीकल  तक  सीमित  हैं। हमारी  प्रेमिकाओं  को  प्रेम  से  अधिक डोमीनोज़, के.एफ.सी  प्रिय  है।
रेणु,  आपने  तो  नारे  भी  बुलंद  किये  थे-
जो  जोतेगा सो बोवेगा
जो बोवेगासो  काटेगा
और  जो  काटेगा
सो  खायेगा.
रेणु,  आज  इन  नारों  के  बल पर  ही  कई  लोगों  का  निबाह  हो  रहा  है।
बचपन  में  कहानियां  बोझ  मालूम  पड़ती  थीं, पहाड़  की  तरह  , मैं  बचकर  भागना  चाहता  था पर रेणु  से  कैसे  कोई  भाग  सकता  है।
बचपन  में  जो  प्रेरणाएं  विष  की  तरह  थीं, आज  वहीं  अमृत  के  समान  है  मेरे  लिए।
रेणु,  आपके  जाने  के  बाद  भी  हमारा  गाँव  नहीं  बदला। हाँ, शहर  जरूर बदल गये  और  उसके  ठेकेदार  तो  हमेशा  बदलते   रहते  हैं।
हमारे  गाँवों  में  आज  भी   बाढ़   आता  है, नित्य  सुखाड़  पड़ते  है। पर  आज  भी  गाँवों  को  कोई   बचाने  नहीं  आता। लोग  अपने  बचाव  के  लिए  वही  बूढ़े  बरगद  की  शरण  में  जाते हैं और  बारिश  न  होने  पर  आज भी  रात  को  गाँव  के  सबसे  बुजुर्ग  आदमी  को  गीली  मिट्टी  से, गोबर  से  नहला  दिया  जाता   है  ताकि  गाँव  की  देवी  इंद्र  के  पास  जाकर  वर्षा  होने  की कामना  कर  सके।

रेणु,  आज  भी  तो  बाढ़  के  नाम  पर  कमिटियाँ  गठित  होती  हैं  और  उसके  सदस्य  जो  होते  हैं, उनकी पटना  से  लेकर  कटिहार  तक  में  हवेलियाँ  खड़ी  जो  जाती  हैं।
आपने  एक  कहानी  लिखी  थी  न,” आदिम  रात्रि  की  महक” , जिसमें  एक  सेवक  अपने  स्वामी  का  बखान  करते  हुए  कभी  नहीं  थकता  है। पर  आज तो  हमसब  स्वामी  हो  गये  हैं, संत  हो  गयें  हैं  और  जो  सेवक  है  उसे  हम  आदमी  नहीं  मानते।
आपकी   मुनिया , जो  चलते  हुए  मुसाफिरों  का  मन  मोहा  करती  थी, आज  उस  हर  मुनिया  में  हम  अपने  हवस  बुझाने  वाली  देह  को  देखते  हैं। आज मुनिया  घूंघट  में  भी  भय  के  मारे  काँपती  है।

रेणु, आज नींद  दस्तक  दे  रही  है। मैं  आपको  अपने  शब्दों  में  आपसे  प्रेम  करना  चाहता  हूँ।

रेणु  आप  जहाँ  भी  है ” प्लीज  टेक  केयर” क्योंकि  आज  समय  बलवान  हो  गया  है, वह  आपको  मिटाने  की  साजिश  कर  रहा  है। समय गाँवों  में  भी  कंक्रीट  का  जंगल  लगाना  चाहता  है, बरगद  और  पीपल  के  पेड़ो  की  बलि  देकर।

रेणु, प्लीज टेक केयर।



(निशान्त कहानियाँ लिखता है.)