सड़कें:एक केस स्टडी (कहानी)




प्रियन्तरा अभी आठवीं कक्षा की छात्रा है पर जिस उम्र में बच्चे कविताओं और कहानियों में अपनी दुनिया खोजते हैं, उस उम्र में ये अपनी दुनिया बनाने का कलात्मक उद्यम करती दिखाई दे जाती हैं।  प्रस्तुत कहानी में जोकि अलग-अलग भागों में अलग-अलग चित्र और विवरण समेटे हुए है, रचनाशील मन की अद्भुत कल्पना-शक्ति का सहज परिचायक है। इस बाल-मन या यूँ कहें कि किशोर-मन से रचना-यात्रा में नए पते तलाश कर लेने की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। तो प्रस्तुत है प्रियन्तरा की ये रचना...
 सड़कें:एक केस स्टडी

सड़क पर गिरती बारिश की बूँदें किसीका खून साफ कर रही हैं। फूटी आंखें ख़ुदा ने किसी और की किस्मत लिखा है तो नज़रें मेरी फूटी क्यों हैं ? अरे! प्यार चाहिए ? सीढ़ियों पर कदम कैसे रखेगा प्यार ? हृदय तो दफ़न है वहाँ, उस सड़क के नीचे। कल जब वह पहिया आया था तो उसकी लाश वहीं पड़ी थी। उसके कटोरे के सिक्के अब तक वहीं पड़े हैं और रोज-रोज की एक नाइंसाफी वही पड़ी रहेगी। रफ्तार जब रास्ता देखे तो किसी की कदर नहीं करती बग़ैर अपनी रफ्तार के। रातों की नींदों से बिस्तर की तरह बिछी सड़क कौन छीन सकता है? ये बूँदें वो मोटी आँसू हैं, जो ज़ख्मों को छिपा देती हैं लेकिन मरहम नही देतीं। दर्द जब हृदय से बाहर आता है, हर रोज कैसा है इन सड़कों को, ''मैं तेरा बाशिंदा हूँ, तेरी चलती-फिरती ज़िंदगी का बाशिन्दा''। हड्डी टूट पड़े कटोरे में खून के छींटे लगे हैं। देख सको तो देख लो, सच्चाई यहां निर्वस्त्र पड़ी है, समाज की हक़ीक़त का एक नंगा सच।  अहंकारी पहिए उसे रौन्द कर निकले हैं और लाल बत्ती का कहीं निशान नहीं है।
सड़क नंबर 2
इस सड़क का नाम किसी महान शासक के नाम पर रखा गया  ताकि इतिहास हमेशा अमर रहे। ये दरिन्दगी उस छत की साज़िश है जो आसमान बनकर खड़ा है, काली शक्तियां बटोर कर अंधेरे के मार्फत बात देता है इन्हें खुदा की ज़मीन पर। मैं इसका रिश्तेदार हूँ और जानता हूँ इसकी हक़ीक़त। इसकी आंखों में छाले पड़ें, जो नाज़िर है इस घिनौनेपन का। दरिंदों के दबोचते हाथ जब किसी मासूम की तरफ बढ़ते हैं।  चीख और रुदन की आवाज़ों को निगल जाता है अंधेरा और तहे-बाम ही ख़ूबसूरती का गला घोंट लेता है।
क्या पता उस सड़क किनारे एक मंदिर हो या मस्जिद भी मगर इंसानियत नहीं है। वो कहती है, ''मेरा कोई महल नहीं है और कोई सड़क भी नहीं। न मेरी मकानें हैं। मेरी तो बस गुल्ली अभी-अभी उड़ी और झाड़ियों में जा गिरी है।'' हर रोज़ किसी असीफ़ा और निर्भया को देख, ठंडी पड़ जाती हैं मेरी आँखें और एक आँसू भी बहा नहीं पातीं।
सड़क नं 3
ये ज़माना कागज़ों पर छपे सोने का है। इंसान के मृत लोभ का काला चिट्ठा फैला हुआ है स्वार्थ के समंदर की तरह। पैसे जेब से निकलेंगे नहीं तो गोली सीधा जाएगी खोपड़ी के अंदर। चिथड़ों में बट जाएगा मृत्यु का शरीर। बंदूक के हाथ नीच दम्भ में फूट पड़ेंगे। बंदूक का भार संभालने वाले देह की उस आत्मा पर चींटियाँ चलना शुरू कर देंगी। ''अगर नज़रें ठहरी हों तो वाहनों की गति सामने से गुज़र जाएगी और मालूम भी न होगा। इतिहासों से बनी हैं ये सड़कें और यूँ ही चलता आ रहा है इनका इतिहास। अगर मेरे हाथ हों तो काट लो इन्हें और उन सैकड़ों फरार गर्दनों पर रख दो कि अगर ये निर्जीव भी हों, तो इनके न्याय का जीव उनकी गर्दनों को पकड़ कर, कटघरे में खड़ा कर दे।'' ऐसा न्याय कहता है, जो बिखरा पड़ा है, इन हादसों के एक-एक लम्हे  में टूट टूट कर। ये विश्व गन पॉलिसी है। हाथ गुमनाम हैं,मौत गुमनाम है लेकिन पिस्टल तो नाम है न ?
सड़क नंबर 4
यही वो जगह है, जहां वीरों ने अपने प्राण न्योछावर किए थें, देश के भविष्य का आकार बनाने के लिए। ये एक युद्ध स्थल नहीं है, एक आकार फुटपाथ का भी है, जहाँ अंधा बनाया गया ईश्वर रोते हुए कुत्ते की तरह दुबक पड़ा है। एक ऐसा ईश्वर, जिसका मूल्य अब एक कौड़ी का भी नहीं रहा। वह ख़ुदा क्या करेगा खुदाई खुद जिसके पाँव आग में झुलसे लोहे की तरह सूज गए हैं। लोहा था इन हाथों के मशगले में भी जो अब चार धाब्बों की कसौटी है। जैसे हड्डियाँ पिघला रही हो चोट।  रहम का चोर है वो जिसे चोरी करके भी संतुष्टि नहीं मिलती। उसकी भीख भी किसीकी भूख है। जिसकी भूख थीं उसकी दो आँखें, उसका एक शरीर, उसके हज़ारों सपने। बुझे हुए बल्ब की तरह पलकों से बाहर निकल आई एक आँख और दूसरी दुबकी-सहमी सी। मक्खियाँ उस गंदगी की रखवालियाँ बनी फिरती हैं, जिन्हें आज तक इंसान साफ नहीं कर पाया। एक भर्रायी हुई मासूम आवाज़ सड़क के सन्नाटों को चीरती हुई आगे बढ़ रही है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक अंगुलीमार ने मरा मरा मरा कहते कहते राम राम कहना शुरू कर दिया था। फर्क फ़क़त इतना है कि वह एक अंगुलीमार था और यहां अपने सपनों को मारने वाला गाता है, ''रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा''। जीने के स्तर को दुनिया ऊँचा करने में लगी है। बैंकों में रोज़ छपते हैं करोड़ों-करोड़ रुपए लेकिन वे मैट्स और टाइल्स पर चलते हैं। कंक्रीट पर चलने वाले उनके पाँव नहीं हैं।
सड़क नंबर 5
पर फैली है रोशनी। बाज़ार सजा हुआ है देर रात तक। बोतलें ही बोतलें। पैरों से फिसलती बोतलें और बोतलों से फिसलते पैर। नशे में धुत्त है रंगीन मिजाज़। गालियों की थूँ - थूँ , बेअदबी ठोकरें और क्षणभंगुर झूठा साहस है। जो बोलियाँ सीधी कभी खड़ी न हो पायीं, वे लड़खड़ा कर जो चाहे सो बोल लें। जो मूर्छित पड़े हैं, उनके ऊपर बदबूदार डायनों के पंख फड़फड़ा रहे हैं। उनके बदबुओं की बस्ती वो खुद में समेट रही है और अपनी भूख मिटा रही है। धरती पर स्वर्ग की कल्पना होती है मगर नरक हर जगह ताश के पत्तों की तरह छितरा  हुआ है। ये उस नर्क का एक तमाशा है, जहाँ नशे में धुत्त नशेड़ी अपनी बद्तमीज़ सोच की नाच नाच रहे हैं। अगर इंसान यहां का मंज़र होता तो वह चौराहे पर लटके फाँसी के फंदे में खुद का गला झोंक देता या फिर बोतलों की बनी मकान की छत से कूद जाता और सड़क पर गिर कर फिर उठता और फिर एक रुहानी शुरुआत करता। ऐसा मेरे अंदर खड़ा इंसान बोलता है।
सड़क नंबर 6
चहल पहल से भरी। स्ट्रीट लाइट सक्रिय। पांव भाग-दौड़ में लगे हैं। गाड़ियाँ रफ्तार में हैं और शहर के ऊपर दिखावे का एक ऐसा माहौल छाया हुआ है जैसे अंधेरे कुएँ में सूरज का प्रतिबिंब दिखा हो। चलो, तो ऐसा लगे मानो शहर कह रहा हो यही कि, ''प्रकाश कवच है मेरा और बुराइयाँ प्रकाश से डरती हैं। मगर हर व्यक्ति के पीछे एक काला साया होता है, जिसे प्रत्यक्षत: प्रतिबिंबित करता है प्रकाश''। पर उन दो जेबकतरों ने अपना शिकार इन्हीं किन्हीं में ढूँढ़ लिया है। एक ओर गड्ढ़ा खुला पड़ा है। वहाँ, उस चौराहे पर आग भड़क उठी है और धूँ-धूँ करके जल रही है दुकान। दूसरी तरफ वे एक दूसरे की जान ले लेना चाहते हैं, झगड़ा करना जिनका मकसद नहीं है।
सड़क नंबर 8
पर आतुर निगाहों की भीड़ लगी है। अरे! शहर में सुपरस्टार आ रहा है! हज़ारों-हज़ार चेहरे ताक में लगे हैं। पैरों के ऊपर पैर चढ़ रहे हैं। भीड़ चिल्ला-चिल्लाकर अपना जश्न मना रही है।एक कार सामने आकर रूकती है। सारी आवाज़ें चुप्प। खट... करता कार का दरवाजा खुला। टक... ब्लैक बूट्स बाहर निकले। भीड़ का सुपरस्टार हाथों को हिला कर अभिवादन कर रहा है और अचानक से ''सुपरस्टार, सुपरस्टार, सुपरस्टार'' करती आवाज़ें उछल पड़ती हैं और अचानक ही धमाका होता है, बम्म.........! कार न जाने कहाँदुम दबा लेती है और कराहटें, चिल्लाहटें, चीख और रुदन माहौल में छा जाता है। यहाँ हैवानियत इंसान के शरीर को किसी फल के छिलके की तरह छील कर चली गई है।
सड़क नंबर 7
पर कर्फ्यू लगा है। दरवाज़े बंद पड़े हैं। दंगा भड़क उठा है।
सड़क नंबर 8
पर नारे लग रहे हैं किसीकी जय-जयकार में।
सड़क नंबर 9
पर बार क्लब खुला हुआ है।
इस कदर मैं देख रहा हूँ, कुछ सड़कें आज़ाद हैं, वहां उजाला है, भीड़ है, पहिये हैं और ज़िंदगी है। पर इसी तरह सड़क नंबर 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 से लेकर असंख्य तक सन्नाटा छाया है। सन्नाटे आवाज़ों के नहीं बल्कि रूठ कर दुख की पड़ी है मानवता वहाँ। इन उमड़ते बादलों के बाबत सूरज शायद जल्दी दस्तक दे दे। मेरी पलकें झपक रही हैं। मुझे नींद आ रही है और एक अफ़सोस जैसे अब भी चुभ रहा है, मेरे दिल में। खून के आँसू न जाने कब टपक पड़े और दुनिया के शरीर का पसीना दहशत से बढ़ता जा रहा है। सड़क नंबर 525 के किनारे एक बड़ा-सा मकान है। देख रहा हूँ, मेरे अँधियारे में भी जाग रहे हैं लोग। दिन रात एक करके मेहनत की जा रही है। समय नहीं उनके पास। कल उन्हें अपनी रिपोर्ट जारी करनी है। किसी भी तरह अब पूरा किया जाना है काम। फ़ाइल्स और डॉक्यूमेंट्स निबटाने हैं क्योंकि कल सुबह वे पेश करने वाले हैं उसे।
बस मेरे आज भर के अंधेरे की बात, कल सुबह तैयार होगी इन गुमनाम सड़कों की एक जानी-मानी केस-स्टडी।
समझ नहीं आता कि दुनिया के आसमान पर मेरे जैसी कौन नकलची रात आ बैठी है?
                                       - प्रियंतरा भारती