पटना में चल रही ग़ैर-कविताओं और यहाँ के अ-कवियों के बारे में सोचते हुए कविता के एक ठेकेदार के रफ़ नोट्स - अंचित






- कविता में ठेकेदारी सम्भव है, यह भी एक बहुत बड़ी बात है. अंतत: कवि विधायक बन पाएँगे यह विचार ख़ुशी देता है. विधायकों को कवि होते और कवि-आलोचकों को विधायकों के यहाँ जाते देखा था. लेकिन पटना की युवा सेन्सिबिलिटी ऐसा सोचती और इतना भरोसा करती है- यह बहुत अच्छा है.

- कवि कहाना दरअसल 16 की उम्र में प्रेमी कहाने जैसा है.  दोस्तों में भाव मिला सो अलग, कवि होने का आकर्षण अलग. निमित और नीयत पर आदमी क्या सोचे. बहरहाल, बात ओपन माइकियों की. वायरल होना नया नशा है. इसके लिए कुछ भी किया जा सकता है. लाईकों के ज़ोर पर जब कैन्सर के मरीज़ों की जान बचाई जा सकती हो और पूरे अफ़्रीका को खाना खिलाया जा सकता हो तो इतने “सेल्फ़-पब्लिशिंग” पोर्टल और अपनी प्रोफ़ाइल पर कुछ भी लिख कर उसको कविता तो मनवाया ही जा सकता है.
            बेचारे मनोज झा, जीवन कविता को दे दिया- काव्य परम्पराओं और अपनी कविताओं के चक्कर में घूमते रह गए और कुल फ़ेसबूक लाइक आए, 10 से 25 के बीच. काहे के कवि हुए!




- ओपन माइक को हाइप बहुत मिलता है. संस्थाएँ भी बहुत हाइप खींच लेती हैं. उनकी मार्केटिंग भी हो जाती है और नया लड़का, जिसने टेढ़े बाल कटाए हैं, जिसने सोचा है कि एक दिन वह दुनिया भर में फ़ेमस होगा, जिसने सोचा है कि उसकी प्रोफ़ायल पर सुंदर लड़कियाँ दिल बनाएँगी - उसको ही तो उत्तर आधुनिक काल में कवि कहाना है.  हीरो हुआ जा सकता था-गिटार बजाया जा सकता था- कविता ही क्यों, जब सब परिश्रम फ़ेमस होने के लिए. या वायरल होने के लिए.
और लिखे हुए को कविता ही क्यों  मनवाना.                                                                                                                                 


वैसे टी.एस. एलीयट एक जगह, मेहनत करने वाले लोगों से भी कहता है, जब तक पच्चीस साल के बाद भी कविता ना लिखते रहो और जीवित रहो, ख़ुद को कवि मत कहो. लेकिन भैया, उसका फ़ेसबूक अकाउंट नहीं है.


- यह एक बड़ा बेसिक सवाल है कि कविता किसको कहा जाए और कवि किसको कहा जाए. चूँकि आर्ट्स सबजेक्टिव है, इसीलिए मामला उलझता है. मामला और उलझता है क्योंकि हमारी सोच उत्तर -आधुनिकता में रची बसी है. संजय कुंदन ने पुस्तक मेले में कहा कि शौक़िया भी बहुत लोग कविता लिखते हैं. मेरा मानना है कि दरअसल ऐसे लोग प्रैक्टिसिंग पोयट्स नहीं होते . संजय कुंदन इसी बातचीत में आगे यह भी कहते हैं कि हो सकता है ज़िंदगी में किसी ने पाँच सौ कविताएँ भी लिखी हों और वह कवि ना हो. ज़ाहिर है जो पाँच सौ कविताएँ लिखेगा उसको कुछ ना कुछ तो अच्छा लिखते ही हैं लेकिन वे कवि नहीं होते. बॉब डिलन एक जगह कहता है कि वह बहुत सारे ऐसे अच्छे कवियों को जानता है जिन्होंने अपने जीवन में एक भी कविता नहीं लिखी.  कहा जाता है कि जिस चीज़ के बारे में आप सीधा बता पाएँ वह कविता नहीं है. सो मैं भी “सजेस्ट” भर कर सकता हूँ. जैसे मृत्युंजय कहते हैं कि गद्य में जो ना कहा जा सके बस वही कविता है. ज़ाहिर है, कई जगह बहुत पारिभाषिक होना होगा और तुकबंदी भर कर के कविता नहीं हो सकती ना आप कवि हो सकते हैं.

- सत्ता के केंद्र के ख़िलाफ़ विरोध की एक मुख्यधारा होती है. उसी पंक्ति में चलते हुए विरोध की एक अंतर्धारा भी होगी. लेकिन उधर नहीं जाना. सत्ता और विरोध की मुख्यधारा के बीच जो जगह है- वह जगह पॉप्युलर कल्चर भरता है - जिसकी फ़ेस वैल्यू विरोध की मुख्य धारा को इमिटेट करती हुई सी होती है. पर वह उस मुख्य धारा का मिमिक भर होता है जिसका उद्भव रीबेल करने के कारणों में ढूँढा जा सकता है. कारणों में फ़्रॉडीयन कॉम्प्लेक्सेज़ से लेकर सामाजिक हीनभावना तक हो सकते हैं. मुझको लगता है कि असल में यह वर्ग अभिजात्य होता है पर इसका चेहरा सूडो-सर्वहारा होता है. उत्तरआधुनिकता इनको यह सुविधा प्रदान करती है कि यह अपनी मान्यताओं के नाम पर हो-हल्ला कर सकें और परिश्रम से बचते हुए अपने को “सही” घोषित कर सकें. यह सीमा साहित्य, संगीत और कला या इनके छद्म रूपों से आगे जाती है. यह उसी आशय का चुनाव है जैसे- ग़लत ट्रम्प की जगह ‘सही” हिलेरी को चुनना. स्टेटस क्वो का एक और खेला.

- कविता लिखने का नया फ़ॉर्म्युला है, ताकि कुछ को भी कविता कहा जा सके. बड़ी साहित्यिक गोष्ठियाँ करने वाले भी यह काम अपने अधिकारों को आवाज़ देने के नाम पर करते हैं.
लेख लिखने वालों को आवाज़ों को जगह देने से दिक्कत नहीं है. लिखे हुए को कविता कह दिए जाने से है, और लिखने वाले को कवि कहे जाने से है.यह जिद्द क्यों?

- एक आम आदमी किसी को कैन्सर का इलाज नहीं बताता. किसी इंजीनियर से कोई मकान बनाने के नक़्शे पर बहस नहीं करता है.  लेकिन कविता में चूँकि गणित नहीं दिखता इसीलिए हर आदमी कविता पर मत दे सकता है और मज़े में बता सकता है कि क्या कविता है या क्या नहीं है. तर्क थोड़े चाहिए. कविता सबजेक्टिव चीज़ है. क्या हुआ जो भाषा परम्परा, काव्य परंपरा और नया लिखा पुराने पर और पुराना लिखा नए पर किस तरह का असर डालता है, इसकी समझ हो कि नहीं.

ब्रो मेरे घर के आगे गु है, मेरे दिल में दर्द है, मैने कुछ लिखा है, ब्रो गु का दर्द है इसीलिए गु है तो कविता है.

- नया कवि (अगर वह गम्भीर है और कविता के लिए या किसी साहित्यिक प्रयोजन के लिए कविता करता है या नहीं भी तो) अमूमन मंच खोजता है. लेकिन उसको इस लोभ से बचना चाहिए और कहीं भी कविता नहीं  पढ़नी चाहिए. उसको इस बारे में बहुत सोचना चाहिए. अपने प्रयोजनों के लिए उसका इस्तेमाल हो सकता है. पटना की एक व्यवसायिक संस्था का मालिक अपने बकवास अकवियों के कार्यक्रम को जस्टिफ़ाई करने के लिए एक कवि मित्र के नाम का इस्तेमाल करता रहा जबकि कई बार उसने ख़ुद माना कि उसको सही स्तर के लोग नहीं मिले थे. 
अगर कवि इस्तेमाल नहीं होंगे तो सम्भव है उनकी प्रशंसा हो जाए. मेरी समझ से इससे भी डरना चाहिए. यह ग़लत चाह जगाती है  और इसका बुरा असर कविता पर पड़ता है.
- कवि के काम क्या क्या हैं? इसपर मैं बहुत सोचता हूँ. एक काम तो है कविता करना.लेकिन मुझे लगता है कवि के पास रीढ़ तो होनी ही चाहिए. उसके पास एक मत भी होना चाहिए. एक राजनीतिक मत. सबके साथ शुचिता आवश्यक लगती है क्योंकि शुचिता के बिना ईमानदारी सम्भव नहीं है. और ईमानदारी नहीं होगी तो सामने वाला व्यक्ति भले ही बहुत अच्छी कविता लिख ले, वो कवि कैसे होगा?


- कवि को सेलिब्रेटी होने से या इसकी चाह से बचना चाहिए!


- कवि को अपने समय के लिखे हुए और पहले के लिखे हुए को पढ़ना चाहिए-

                             यह भी बहुत पुरानी बात. सिर्फ़ यहाँ जमा कर रहा हूँ. 


- जो सुनने में अच्छा लगता है, वह पढ़ कर भी उतना ही अच्छा लगता है क्या? यह कविता से जुड़े हर आदमी को सोचना चाहिए.


- अच्छी कविता पढ़ना और कविता को अच्छे से पढ़ना दो बातें हैं. 

- जैसा युवा कवि बालमुकुंद कहता है, “(आम तौर पर) ओपन माइक पोएट्री जैसे आयोजनों में सारी चीज़ें होती हैं सिवाय पोएट्री. वहाँ एक विचित्र तरह का शोर है, कविता पब्लिक करने के नाम पर रैंप शो टाइप ट्रीट करने की निर्लज्ज मानसिकता है, एक खास प्रकार का सलेब्रेटिसम है जो सीधा सीधा कैप्टिलिज्म का सहोदर है और अंतर्मन से उसी पर वृत्त हैं. एक वैचारिक शून्यता है जहां कविता की जगह कविता के नाम पर आदिम अश्लील प्रवृत्तियों का बेवजह पुनर्स्थापन है जिसकी एक एक गतिविधि न सिर्फ़ अच्छी और गंभीर कविता के विरोध में खड़ी होती है, बल्कि उसका सुनियोजित तरीके से उपहास करती है. 


- कविता को “परफ़ॉर्म” करना एक पूँजीवादी विचार लगता है - आदमियत से बहुत दूर. परफ़ॉर्म शब्द के आधुनिक अर्थ में जो दबाव निहित है, साहित्य उन दबावों से मुक्त करने के लिए होता है. 


- शुद्धतावादी होना अपने में बुरी बात नहीं है जैसे कलावादी होना भी कोई बुरी बात नहीं है. कविता में आप इन दोनों के साथ हैं या नहीं, इसका निर्णय कैसे होगा. तब तक तो नहीं ही होगा, जब तक लिखे हुए को कविता ही ना कहा जा सके.  फिर वही प्रश्न है कि लिखा हुआ जो कुछ भी है क्या वह कविता है- अगर है तो अच्छा है या बुरा है- परिमाण तो चाहिए ही. 


- कला में और कविता में अनंत सम्भावना है. यह ग़लत बात है. “अनंत” शब्द ख़ुद एक सीमा का बोध कराता है और किसी अन्य दूरी की तुलना में होता है. इसी तरह कला या कविता के विशेषण भी इंडिपेंडेंट नहीं हो सकते. 

- किसी भी राजनीतिक स्टैंड से परहेज़,सुविधा है जो बहुत स्थापित कवि भी कई बार ले लेते हैं.  कई बार यह बहुमत के साथ चलना भी है. मुझे लगता है कि कविता अपने बेसिक नेचर में माईनौरिटी की तरफ़ झुकी होती है. फिर भी यह व्यक्ति-विशेष के मत और उसकी शुचिता का सवाल है. कविता इससे मुक्त होगी. 

- आलोचना हमेशा विज्ञान के ज़्यादा नज़दीक होगी. वहाँ तर्क चाहिए होंगे. 


- कविता के स्तर का निर्धारण समाज से नहीं होता. कीट्स को समीक्षकों तक ने ख़ारिज कर दिया था. डन को चार सौ सालों के लिए भुला दिया गया था. हिंदी के अच्छे से अच्छे कवि को कई बार दो सौ रुपए की रॉयलटी मिलती है. समाज का ख़ारिज करना उनको काव्य परम्परा से विमुख नहीं करता. The present alters the past and the past alters the present. काव्य परम्परा की बात करते हुए एलीयट कुछ इस तरह की बात करता है. 

- कला की श्रेणी का निर्धारण समाज पर छोड़ना चेतन भगत को हमारे समय का सबसे महान लेखक बना देता है. 




- ओपन माइक कार्यक्रमों में भी एक दो अपवाद सम्भव हैं. एक उदाहरण सृष्टि का है जो बनारस में रहती है और बढ़िया कविता लिखती है. पटना के संदर्भ में लेख लिखने वाला बहुत उम्मीद के साथ अपवाद खोज रहा है पर अभी तक असफल रहा है. 


- अंत में, ओपन माइक जैसा आयोजन (हालाँकि नाम से यह बहुत लोक-तांत्रिक लगते हैं)  साहित्य की उत्सवधर्मिता को इंगित करता है. साहित्य में उत्सवधर्मिता है, यही ख़याल मुझे सबसे ज़्यादा डराता है.

बाक़ी लोकतंत्र पर सोचते हुए प्लेटो याद आते हैं और मैं ग़ुलामों के बारे में सोचता हूँ.

चार पाँच साल में ही स्थिति बदली है और कविता करने के लक्ष्य और कविता से आकांक्षाएँ - दोनों भीषण रूप से बदली हैं. 
कवि कहा जाने की यह सनक, कम से कम नए युवाओं को ख़राब करती हुई दिखती है  जो शायद ख़राब होना भी चाहते हैं. 

जो जेनुइन कविता से प्रेम करते हैं वे दुखी हो सकते हैं लेकिन जो डेकडेंस सभ्यता में फैल रहा है कविता उससे कैसे अछूती रहे? 


 
अंचित

(नोट्स पहले भी www.dpillar.com पर  छप चुके हैं.)