उड़ान का वह नन्हा डाकिया (कहानी)

अभिनंदन दसवीं कक्षा का छात्र है और कवितायें और कहानियाँ लिखता है। गढ़ता है चित्र और चित्रों के कई-कई मायने। आजकल के किशोर जो लिख रहे हैं या लिखना चाहते हैं, उनके लिए अभिनन्दन एक अच्छा उदाहरण हो सकता है। अभी इस उम्र में उसकी कल्पना-शक्ति प्रखर और पूर्ण-रूप से संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। 'हर्थ' पर आज प्रस्तुत है अभिनंदन की कहानी 'उड़ान का वह नन्हा डाकिया'।

कहानी - उड़ान का वह नन्हा डाकिया

आँखों की सफेदी में पीलापन आ चुका था ।आज फिर वह कुछ ताक रहा था । बैठा बैठा खिड़की के बाहर । छोटी सी खिड़की । मजबूती से बंद । मजबूत जालो से घिरी । उसकी पुतलियां वहीं ठहरी थी । बिल्कुल स्थिर और एकटक ।
       गुजरते बसंत की ढलती शाम । मध्दिम लाली लिए अलसाती हुई एक किरण आहिस्ता से खिड़किया पार कर कमरे में खड़ी थी। चंद सेकंड , कुछ मिनट, थोड़ी देर और बस...। सूरज ने अपनी धुप का गुच्छा समेट लिया।  आसमान बिल्कुल साफ था। खूबसूरत सा नीलापन। उसमें हल्के हल्के बादल तैर रहें थें। इन बादलों से उसे कुछ  लगाव था । कुछ खास था । वह इनकी तरह आजाद उड़ना चाहता था। पर वह इस कमरे में ...। फिर भी उसके अंदर भी बादलों की तरफ बहुत कुछ भरा हुआ था । उसे कमरे की फर्श बहुत रूखी लगती थी। ख्वाहिश थी एक बादल से मखमली बिछौने की। ख्वाहिश थी एक गर्म मुलायम तकिए की ।
        आह! सलाखों के खुलने की आवाज। उड़ती निगाहे कमरे में लौट आयीं। काफी वक्त बाद पुतलियों ने मुड़ने का इरादा किया । एक थाली फेकी गई थी अंदर । रोजाना की सूखी रोटियां और सूखे निवाले । उसने उन्हें तोड़ा, गटका भी , पर बेमन से । हौले से आंखों की तितलियाँ फिर उड़ी और खिड़की से बाहर । 
         हल्का चांद ,हल्की रोशनी और  उजली बारिश य मानो चमेली की पंखुड़ियों का रंग झड़ रहा था । उसने देखा दूर जंगल के पेड़ इसमें भींग रहे थे । वह भी इस में भींगना चाहता था। अभी से नहीं वर्षों से । पर सिर्फ चाह कर रह जाता । उसकी इस बेइंतहा चाहत में गुलामी की निशानी थी, कैदी का गम और बेमक़सद अफसोस ।
             बाहर बहती मस्त हवा थी। चांद की रोशनी से खुदा का गुलिस्ता गुलजार था। अचानक उसकी पुतलियां रुकी । आँखों की पीलेपन में चमक उभरी। पंख से बिखरा एक नन्हा सा फर।  आहिस्ता आहिस्ता । हवा में झूलता जमीन पर उतर रहा था । कोमल सा और मुलायम । उस की पुतलियां उसी पर ठहरी थीं। लगता था चांद के कोट से गिर
गया हो । या फिर किसी उजले पुष्प की उजली पंखुड़ी । हकीकत में  तो वह एक छोटा सा पंख था।  चिड़िया के पंखों से फिसला , कोमल सा फर था ।
         आह्! सलाखों के खुलने की फिर वही आवाज ।  हवलदार ने थाली की तरफ इशारा किया । उसने जल्दी से बची रोटियां निगली। गट गट गट । जल्दीबाजी में पानी पी ।घसीटकर थाली को आगे कर दिया । बूढ़ीं आँखें थक चुकी थीं।  अब इन में फिर से ख्वाबों की परवाज भरने की ताकत ना थी।  उसनें अपनी बेड़ियाँ  घसीटी और उसी रूखे फर्श पर लेट गया । नींद नहीं आ रही थी । वह कुछ गुनगुना रहा था।  मीठा नहीं पर दर्द था । बाहर की आजाद हवा से उसे चिढ़ हो रही थी। कैदखाने में जहां कुछ पत्थर उजले भी पड़े हुए थे वहां आकर घुटन से भर जाती थी। उसके माथे में उसकी ख्वाहिशों की जद्दोजहद थी तो एक तरफ उन गिरते फरों को छूने की आशा।  इन सबके उधेड़बुन  में ना जाने रात्रि के किस पहर उसे नींद आई। 
          शांत कमरा । खिड़की से थोड़ी ठंडी हवाएं अंदर आ रही थी । ऊपर बल्ब का आधा शीशा टूटा हुआ था । हवलदार को भी ठीक से याद नहीं कि उसने इसे जलते आखरी बार कब देखा था । ठंडी लोहे की सलाखे । आगे लटकी तख्ती कैदखाना नंबर - 4।  बस खर्राटों झींगुर की आवाज सुनाई पड़ती थी।  आसमान साफ व नीला था।  चांद जैसे नील मैं धुलता सफेद पोशाक हो और तारे बिखरे हुए गाज के छींटे। 
अचानक हवा ने एक मीठा गीत गुनगुनाना शुरू किया । बारी बारी सब के कानों में गाई।  उसके भी जो वहां फर्श पर लेटा था ।
       वह जाग उठा ।आहिस्ता आहिस्ता । उसने देखा वह उजला सा फर जाने कहां से उसकी हथेली पर बैठ गया है । वह आज तक उसे खिड़की के बाहर गिरता ताकता  था।  अपनी उंगलियों से उसने पहली बार उसे छुआ । बेहद कोमल जैसे रुई का टुकड़ा । शायद इनसे ही आसमान इतने मुलायम बादल बनता होगा। अकस्मात ही उसे लगा किसी बादल का तागा उधड़ गया। अब उसमें से केवल फरों की बारिश हो रही थी । उजले उजले छोटे मुलायम फर|इन फरों में जैसे दूध के  रेस्से लगे हो ।
          उस कमरे में भी कुछ फर आकर बिखर गए । उसने उन्हें हाथों में उठा लिया । एक को हथेलियों पर रखा । हौले से खिड़की के पास ।फूँ...उसके मुंह से हवा का एक झोंका निकला और फर उड़ चला।  उसने देखा अचानक कैदखाने की दीवारें उड़ गई । सलाखों की बंदीशें से हट गईं।  अब खुला आसमां था और वह एक बादल की तरह । बस जहाँ जी करें उधर उड़ चले ।
           तभी हवा में उड़ता वह फर जमीन पर जा बिखर पड़ा। खिड़की के बाहर।  फिर से वही सलाखें वही दीवारें । उसने फर को फिर से हथेलियों पर रखा। खिड़की के पास । फूँ... उसके मुंह से हवा का दूसरा झोंका  निकला और फर उड़ चला।  
       उसने देखा चांद छिप गया। रात ढल गई ।सुबह हो चुकी थी उसे रिहा कर दिया गया था।  हवलदार ने जब उसे बताया तो वह खुशी से उछल पड़ा अब उसे लेने उसके घर वाले आएंगे, कितने दिनों बाद उसे लजीज खाना नसीब होगा ,अच्छी पोशाक मिलेगी।  अब खुली सड़क होगी सलाखें नहीं । हवलदार ने दरवाजा खोला । इस कैदखाने से बाहर निकलने के लिए वह दौड़ा मगर.... 
      अब तक वह उड़ता पर जमीन पर गिर चुका था ।फिर से वही रात बंद सलाखें और कैदखाना।  दबती ख्वाहिश और तड़पती संतप्ता।  इस बार उसने फर को हथेली पर रख कर पूरे जोर से फूँका। सुखी रोटियों का सारा दम लगा दिया । और एक बार फिर से फर उड़ चला ।
        अब उसने देखा यह कैदखाना गायब हो गया। उसे नीचे की रूखी फर्श महसूस हुई । तभी वहां एक फरों से बुना मखमली बिस्तर आ गया । फरो से बुना एक ताकिया । वह जानता था यह सब जल्दी खत्म हो जाएगा। पर वह इसे खोना नहीं चाहता था । वह दौड़ कर उस बिस्तर पर जा लेटा । सर को तकिए पर रखा और जोर से आंखे भींच ली । अब वह इस ख्वाब के बाहर नहीं आना चाहता था । अपने अस्तित्व में उसे ठंडा पन महसूस हुआ पर उसने आंखें नहीं खोली ।
           सुबह हुई । सूरज की सिन्दूरी आभा लिये किरणें कैदखाने में आकर खड़ी थीं। जो कैदखाने में हो कर भी कैद नहीं थी । आसमान कल से अधिक साफ व नीला था।  बाहर कुछ नये कैदीं आऐं थें। और अब भी खिड़की पर एक नन्हे से फर का बदन हिल रहा था।
       हवलदार ने सलाखें खोली । आस-पास मुआयना किया । फिर बाहर निकल कर साहिब को सलूट किया,
    " हुजूर कैदखाना नंबर 4 खाली है।"
 

-अभिनंदन गोपाल