युवा कविता #23 : यावर राशिद



बी.कॉम प्रथम वर्ष के छात्र यावर, ग़ज़ल और नज़्म लिखने में दिलचस्पी रखते हैं। पटना सिटी के दीवान मुहल्ला में इनका निवास है।

१.

कोइ नक़ाब रुख़ से जो सरका के रह गया
इक ख़्वाब था जो मुझ को नज़र आ के रह गया ।

इक आइना ये हुस्न को दिखला के रह गया
ज़िक्र-ए-जफ़ा पे आप में शरमा के रह गया ।

गुलशन मिरा तबाह हुआ फ़स्ल-ए गुल के हाथ
मजबूरियों पे अपनी मैं गम खा के रह गया ।

हासिल है राब्तों से ज़माने में दिलकशी
निकला जो गुल चमन से वो मुरझा के रह गया ।

हसरत मिरी निगाह की कहती है बार-बार
मंजिल कहाँ थी और कहाँ आ के रह गया।

शायद सुकून दिल को मिले, मुझ को शाम-ए-ग़म
तार-ए-नफ़स पे चंद ग़ज़ल गा के रह गया।

नाहीद-ओ-कहकशाँ पे तसर्रुफ़ है आजकल
कौन-ओ-मकाँ पे मेरा जुनूँ छा के रह गया।

यावर वही है मुजरिम-ए-मुस्तकबिल-ए ह़यात
दार-ओ-रसन से आज जो घबरा के रह गया।

२.

ह़क़ीक़त के जल्वे निहाँ और भी हैं
ज़मीं और भी आसमाँ और भी हैं।

गुज़र जा नशेब-ओ फराज़-ए जहाँ  से
ह़िजाबात-ए-कौन-ओ मकाँ और भी हैं।

घटाओं ज़रा बिजलियों से ये कह दो
अभी शाख़ पर आशियाँ और भी हैं।

मिलेंगे युहीं सिलसिले अह्ल-ए-दिल के
रह-ए-इश्क़ में कारवाँ और भी हैं।

जगा दे उन्हें इंक़लाब-ए-ज़माना
कि मसरूफ़-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ और भी हैं।

ये उफ्ताद-ए दार-ओ-रसन कुछ नहीं हैं
रह-ए-इश्क़ में इम्तिहाँ और भी हैं।

समझ खुद को तन्हा न राह-ए-तलब में
तिरे साथ अब कारवाँ और भी हैं।

छुपेगा न यावर ये राज़-ए-मोह़ब्बत
अदू के सिवा राज़दाँ और भी हैं।

३.

तीरगी बढ़ गइ ज़माने की
फ़िक्र है शम्ए-दिल जलाने की।

एअतेमाद-ए-ख़ुदी बड़ी शय है
क्या ज़रूरत है सर झुकाने की।

मुन्कशिफ़ उस पे है रिमोज़-ए-ह़यात
जिस को आदत है ग़म उठाने की।

आँखें कहती हैं दास्तान-ए-फिराक़
है कहाँ ताब लब हिलाने की ।

तुम से क़ायम थी दिलकशी सारी
तुम थे रौनक़ ग़रीबख़ाने की।

दिल को "यावर" फ़रेब देती है
हाय! ये सादगी ज़माने की ।